सात जन्मों के पाप की निवृति, विजय प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण करने हेतु बुधाष्ट्मी पर्व

मुकेश ऋषि
भारतवर्ष में हमारे हिन्दू धर्म में प्रत्येक दिन किसी न किसी महत्व से जुड़ा होता है। यहां मौजूद तिथि, नक्षत्र और दिनों के मेल होने पर कोई उत्सव, व्रत, त्यौहार इत्यादि संपन्न होते हैं। इन सभी का मेल एक उत्साह और विश्वास के साथ भक्ति और शक्ति के प्रतिबिंब को दर्शाने वाला होता है। इसी में एक व्रत आता है बुधाष्टमी व्रत। बुधाष्ट्मी व्रत को बुधवार के दिन अष्टमी तिथि के पड़ने पर किया जाता है। श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया गया बुधाष्टमी व्रत जीवन में सुख को लाता है। इसके पश्चात् मृत्यु के बाद मोक्ष को प्रदान करने में सहायक बनता है। कुछ मान्याताओं के अनुसार यह व्रत धर्मराज के निमित्त भी किया जाता है। बुध अष्टमी का व्रत करने वाले व्यक्ति को मृत्यु के पश्चात् नरक की यातना नहीं झेलनी पडती है। व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है। उनके जीवन में शुभता आती है। बुधाष्टमी का व्रत, त्यौहार, पर्व पौराणिक और लोक कथाओं के साथ जुड़ा हुआ है। बुध अष्टमी का उपवास करने से व्यक्ति के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और सात जनमों के पाप नष्ट हो जाते हैं। हमारे शास्त्रों में अष्टमी तिथि को बहुत ही महत्वपूर्ण बताया गया है। जिस बुधवार के दिन अष्टमी तिथि पड़ती है, उसे बुध अष्टमी कहा जाता है। बुध अष्टमी के दिन सभी लोग विधिवत् बुद्धदेव और सूर्यदेव की पूजा अर्चना करते हैं। मान्याताओं के अनुसार जिन लोगों की कुंडली में बुध कमजोर होता है, उनके लिए बुध अष्टमी का व्रत बहुत ही फलदायी होता है। अष्टमी तिथि का हिंदू धर्म परंपरा में काफी महत्व है। यह चन्द्र पक्ष के दो समय पर आती है। एक शुक्ल पक्ष के समय और दूसरा कृष्ण पक्ष के समय। इन दोनों ही समय पर बुधवार का संयोग इसे और ही शुभता देता है। यह तिथि प्रत्येक माह में दो बार आती है, जो अष्टमी तिथि शुक्ल पक्ष में आती है, उस दिन बुधवार का समय होने पर बुधाष्टमी का पर्व अत्यंत शुभदायक होता है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी के स्वामी भगवान शिव हैं। इसके साथ ही यह तिथि जया तिथियों की श्रेणी में आती है, इस कारण से ये बहुत ही शुभ मानी गयी है। बुधाष्टमी पर्व विजय की प्राप्ति के लिए बहुत ही उपयोगी होता है। यह व्रत उन कार्यों में सफलता दिलाने में बहुत सहायक बनता है। जिनमें व्यक्ति को साहस और शौर्य की अधिक आवश्यकता होती है। धर्मराज, मां दुर्गा और शिव की शक्ति के लिए बुधाष्टमी का व्रत का बहुत महत्त्व होता है। इस व्रत की ऊर्जा का प्रवाह व्यक्ति को जीवन शक्ति और विपदाओं से आगे बढ़ाने की क्षमता देता है। जिस पक्ष में बुधाष्टमी का अवसर हो उस दिन यह सिद्धि का योग बनता है। बुधाष्ट्मी तिथि में किसी पर विजय प्राप्ति करना उत्तम माना गया है। यह विजय दिलाने वाली तिथि है। इस कारण जिन भी चीज में व्यक्ति को सफलता चाहिए, वह सभी काम इस तिथि में करे तो उसे सकारात्मक फल मिल सकता है। यह दिन बुरे कर्मों के बंधन को दूर करता है। इस दिन लेखन कार्य, घर इत्यादि वास्तु से संबंधित काम, शिल्प निर्माण से संबंधी काम अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले का आरंभ भी सफलता देने वाला होता है। बुधाष्ट्मी का व्रत करने के लिए पहले से ही सभी तैयारियाों को कर लेना भी सही होता है। व्रत के पहले दिन व्रती को चाहिए कि वह सात्विकता और आध्यात्मिकता का आचरण करें। बुधाष्ट्मी के दिन व्रती को चाहिए कि वह ब्रह्म मुहूर्त के समय पर उठना चाहिए। यदि संभव हो सके तो इस दिन किसी पवित्र नदी या सरोवर इत्यादि मे स्नान करना चाहिए। पर अगर ये संभव हो सके तो इस दिन घर पर ही स्नान कार्य करना चाहिए। घर पर अपने नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करना गंगा स्नान जैसा फल दिलाने वाला होता है। अपने नित्य कार्यों को कर लेने के बाद व्रती को पूजा का संकल्प लेना चाहिए। पूजा स्थान पर एक पानी से भरा कलश स्थापित करना चाहिए। इस कलश को घर के पूजा स्थान में स्थापित करना उत्तम होता है। बुधाष्टमी के दिन बुधदेव व बुध ग्रह का पूजन किया जाता है। पूजा में बुधष्टमी कथा का पाठ भी करना उत्तम फल प्रदान करने वाला होता है। भक्त को चाहिए कि इस दिन व्रत का संकल्प भी धारण करें। बुधाष्ट्मी के व्रत के अवसर पर संपूर्ण दिन मानसिक, वाचिक और आत्मिक शुद्घि का पालन करना चाहिए। इस भगवान के समक्ष धूप-दीप, पुष्प, गंध इत्यादि को अर्पित करना चाहिए। भगवान को विभिन्न पकवान और मेवे, फल इत्यादि को अर्पित करना चाहिए। बुध भगवान की पूजा विधिवत् तरीके से संपन्न करनी चाहिए। पूजा, अर्चना करने के पश्चात् भगवान बुध देव को भोग लगाना चाहिए। पूजा समाप्ति के बाद भगवान का प्रसाद सभी लोगों में वितरित करना चाहिए। कई जगहों पर बुध अष्ट्मी के दिन भगवान शिव और पार्वती की पूजा होती है। श्री विष्णु भगवान का पूजन, श्री गणेश जी का पूजन भी किया जाता है। इस दिन घर को अच्छी तरह से साफ सुथरा करके इष्ट देव की पूजा करनी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार बुध अष्ट्मी के दिन भगवान की पूजा करना जीवन में सकारात्मकता और शुभता लाने वाला माना जाता है। भविष्यपुराण में कथा है-बुधाष्टमी की कथा का संबंध वैवस्वत मनु से भी संबंधित बतायी गयी है। इसके अनुसार मनु के दस पुत्र हुए और एक पुत्री इला हुई थीं इला बाद में पुरूष बन गयी थी। इला के पुरुष बनने की कथा है कि मनु ने पुत्र की कामना से मित्रावरूण नामक यज्ञ किया, पर उस प्रभाव से पुत्री की प्राप्ति हुई। कन्या का नाम इला रखा गया। इला को मित्रावरुण ने उसे अपने कुल की कन्या अौर मनु का पुत्र इल होने का वरदान दिया था। एक बार राजा इल एक शिकार का पीछा करते हुए ऐसे स्थान में जा पहुंचे, जिसे भगवान शिव और पार्वती ने वरदान दिया था कि उस स्थान में जो भी प्रवेश करेगा, वह स्त्री रूप में हो जाएगा। उस प्रभाव के कारण वन में इल के प्रवेश करते ही वह स्त्री में बदल जाते हैं। इला के सुंदर रूप को देखकर बुध उनसे प्रभावित हो जाते हैं। इला से विवाह कर लेते हैं। इला और बुध का विवाह के अवसर के रूप में बुधाष्टमी मनाने की परंपरा रही।

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