बच्चों में होने वाला एज्मा

 

दमा या एज्मा (दमा) सिर्फ बड़ों को ही नहीं होता, यह बच्चों में भी पाया जाता है। दिल्ली जैसे शहर में जहां विश्व भर में सब से अधिक प्रदूषण पाया जाता है, अब से केवल 3 दशक पहले केवल 5 प्रतिशत बच्चे ही दमा रोग से पीड़ित थे, पर आज इस महानगर के 25 प्रतिशत बच्चे इस रोग से पीड़ित हैं पर इस का मतलब यह कदापि नहीं है कि दमा केवल प्रदूषण के कारण ही होता है। एज्मा क्या है?

एज्मा एलर्जी का ही एक रूप है। यदि एलर्जी से फेफड़े प्रभावित हों तो उसे एज्मा कहते हैं। घर में सफाई के दौरान या बाहर धूल आदि होने के कारण अक्सर एज्मा का दौरा पड़ जाता है।

दमा एक प्रकार की एलर्जी है। एलर्जी नाक में भी हो सकती है और चमड़ी में भी। यहां पर हम जिस एलर्जी की बात कर रहे हैं, उसमें फेफड़ों की नलियों में सांस की रुकावट हो जाती है, जिस के कारण बच्चे को सांस लेने में परेशानी होती है। यह स्थिति काफी तकलीफदेह होती है और कभी-कभी जानलेवा भी हो सकती है। बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है इसीलिए कोई भी बाहरी वस्तु फौरन ही एज्मा के लक्षण पैदा कर सकती है। बच्चे में जब दमा होता है तो देखा जाता है कि उसकी सांस बहुत तेज चलने लगती है, खांसी आने लगती है, बेचैनी महसूस होती है। बच्चे के सांस लेने पर सीटी की सी आवाज सुनाई देने लगे तो समझना चाहिए कि दमा बहुत अधिक हो गया है।

यदि शरीर नीला पड़ जाए, नब्ज तेज चलने लगे, जागते हुए भी लगे कि बच्चा सो रहा है और सांस प्रति मिनट पचास से ऊपर हो तो ऐसे दमे को गंभीर अवस्था वाला दमा माना जाता है। ऐसे में बच्चे को फौरन अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए। एक बात याद रखिए। लुभावने विज्ञापनों के भ्रम जाल में न फंसें जैसे कि जिंदा मछली खिला कर दमा बिलकुल ठीक हो जाता है वगैरह वगैरह।

जुकाम होने, पालतू कुत्ते-बिल्लियों के बालों, धूल-मिट्टी-कीटाणु से घर में मिट्टी, धुआं, प्रदूषण आदि कारणों से दमा बिगड़ जाता है। पेड़ पौधों के पराग से भी बच्चों में दमा होते देखा गया है विशेषत: बच्चों में हंसना-रोना, उत्तेजित या उदास होना भी एज्मा के दौरे को बढ़ावा दे सकता है।

सिगरेट का धुआं एवं आमतौर पर ली जाने वाली दर्द निवारक गोलियों के प्रयोग से भी हालत बिगड़ सकती है। अनाज व कपास की धूल या छौंक लगाते समय निकलने वाले धुएं से भी दमा हो सकता है। दमा होने के कारण कोई भी क्यों न हो, यह संक्रामक रोग नहीं है, यह एक व्यक्ति से दूसरे को नहीं फैलता। इस बीमारी में शरीर के अंदर ही दोष पाया जाता है।

एज्मा का पूर्ण इलाज अब तक ढूंढा नहीं जा सका है, लेकिन आजकल मिलने वाले सुविधाजनक इनहेलर्स की मदद से एज्मा के मरीज किसी हद तक सामान्य जीवन बिता सकते हैं। इनहेलर्स दो प्रकार के होते हैं-प्रिवेंटर इनहेलर्स और रिलीवर इनहेलर्स। एक इनहेलर देकर सांस की नली में आई सूजन को ठीक करते हैं। इन्हें स्टीरायड इनहेलर’ कहते हैं। दूसरे, वह जो कि हवा की नलियों की सूजन को दूर करते हैं। इन्हें ब्रोंको डायलेटर इनहेलर’ कहते हैं। इसके अलावा बच्चों को मुंह से पीने वाली दवाई दी जाती है जिस से बलगम पतला हो कर निकल जाए। केवल सादे गरम पानी की भाप से भी बलगम पतला हो सकता है। जिन बच्चों को ‘इनहेलर’ लेने में परेशानी होती है, उन्हें डॉक्टर एक ‘मैकेनिकल डिवाइस’ यानी एक प्लास्टिक की बोतल के आकार के उपकरण से दवाई देते हैं। अगर बच्चा सांस नहीं ले पा रहा है तो मुंह पर मास्क रख कर दवाई दी जाती है। यह सब विशेषज्ञ की निगरानी में ही किया जाता है। दमा ठीक हो गया है, इस का पता तभी चलता है, जब सांस लेने में बच्चे को परेशानी न हो और खांसी भी नहीं आए।

 

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