अपने पेट में दूसरे का बच्चा… शारीरिक संबंध जरूरी नहीं! जानें क्या है सरोगेसी

कोलकाताः आज जो खबर सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रही है वो है प्रियंका चोपड़ा का मां बनना। प्रियंका सरोगेसी के माध्यम से मां बनी है। सरोगेसी को सामान्यत: किराये की कोख भी कहा जाता है। सरोगेसी बच्चा पैदा करने की एक नई तकनीक है। जब माता या पिता में किसी की भी शारीरिक कमजोरी की वजह से बच्चा पैदा करने की क्षमता नहीं होती, कोई कमी रहती है या फिर बच्चे की वजह से परेशानियों की आशंका होती है तो वे इसी तकनीक का सहारा ले सकते हैं।
सरोगेसी में होता क्या-क्या है?

अबतक आप यह तो समझ गए होंगे कि सरोगेसी का मतलब है, दूसरे के बच्चे को अपनी कोख में पालना। इसके लिए सरोगेट मदर पैसे चार्ज करती है। दंपती की ओर से सरोगेट मदर की प्रेग्नेंसी के दौरान स्वास्थ्य का पूरा ख्याल रखना और सारे खर्च की जिम्मेदारी लेना दंपती के हिस्से होता है। स्पष्ट है कि किसी महिला की कोख किराये पर ली जाती है।

किराये की कोख में कैसे जाता है बच्चा?

ज्यादातर लोग यही जानते हैं कि बच्चा पैदा होने के लिए पति और पत्नी या कहिए कि महिला और पुरुष के बीच सेक्शुअल रिलेशन होना जरूरी होता है, लेकिन ऐसा नहीं है। मिमी फिल्म में भी कृति आश्चर्य जताती हैं कि बिना दूसरे के साथ सोए भी बच्चा पैदा हो जाएगा! बिल्कुल सरोगेसी में यही तो होता है।

किराये की कोख के लिए दूसरी महिला को तैयार करने के बाद डॉक्‍टर आईवीएफ तकनीक के जरिए पुरुष के स्पर्म में से शुक्राणु लेकर उसे महिला की कोख में प्रतिरोपित करते हैं। सरोगेट मदर बनने वाली महिला और दंपत्ति के बीच एक खास एंग्रीमेंट किया जाता है। सरोगेट मदर को प्रेग्नेंसी के दौरान अपना ध्यान रखने और मेडिकल जरूरतों के लिए तो पैसे दिए जाते ही हैं, सरोगेसी के लिए वह अलग से एक अमाउंट चार्ज करती हैं।

दो तरह की होती है सरोगेसी
ट्रेडिशनल सरोगेसी: पारंपरिक सरोगेसी में किराये पर ली गई कोख में पिता का स्पर्म महिला के एग्स से मैच कराया जाता है। इस सरोगेसी में बच्चे का जेनिटक संबंध केवल पिता से होता है।
जेस्टेशनल सरोगेसी: इस विधि में पिता का स्पर्म और मां के एग्स को मेल टेस्ट ट्यूब के जरिए सेरोगेट मदर के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है। इससे जो बच्चा पैदा होता है, उसका जे​नेटिक संबंध दोनों से होता है।
थोड़ा और विस्तार से ऐसे समझिए

सरोगेसी में आईवीएफ (आईवीएफ) तकनीक का इस्तेमाल होता है। आईवीएफ यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन। डॉयचे वेले की एक हेल्थ रिपोर्ट में इशा भाटिया सेनन बताती हैं कि फर्टिलाइजेशन का मतलब हुआ- पुरुष के स्पर्म और महिला के एग्स का मिलना, जिससे भ्रूण तैयार होता है। इन विट्रो का मतलब हुआ ग्लास के अंदर। यहां इसका ​अर्थ होगा- टेस्ट ट्यूब के अंदर। तभी तो इस तकनीक को टेस्ट ट्यूब बेबी के नाम से भी जाना जाता है।

सामान्यत: जो प्रक्रिया महिला के शरीर के अंदर होती है, उसे इस तकनीक में बाहर यानी लैब में किया जाता है। महिला के शरीर से एग निकाल कर सुई के जरिये उसमें स्पर्म डाला जाता है। जब भ्रूण तैयार हो जाता है तो इसे एक मेडिकल ट्यूब के जरिये भ्रूण को महिला के गर्भाशय में ​डाला जाता है।

इन परिस्थितियों में ली जा सकती है सरोगेसी की मदद

– जब तमाम प्रयासों और इलाज के बावजूद महिला गर्भधारण नहीं कर पा रही हों, तो सरोगेसी एक अच्छा विकल्प साबित होता है।

– जब तमाम कोशिशों और इलाज के बावजूद भी महिला का गर्भपात हो रहा हो तब सरोगेसी की मदद ली जा सकती है।

– भ्रूण आरोपण उपचार के फैल्योर के बाद सरोगेसी के जरिए बच्चा हासिल किया जा सकता है।

– गर्भाशय या श्रोणि विकार होने पर सेरोगेसी को ऑप्शन के तौर पर देखा जा सकता है।

– हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट प्रॉब्लम या अन्य गंभीर जेनेटिक स्वास्थ्य समस्याओं में भी कई बार डॉक्टर सरोगेसी का सहारा लेने की सलाह देते हैं।

 

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