विद्यापति की शृंगारिक रचनाओं के नायक-नायिका समाज को पढ़ाते हैं मर्यादा का पाठ

दरभंगा : मैथिली के प्रसिद्ध विद्वान एवं लेखक डॉ. शांतिनाथ सिंह ठाकुर ने मैथिली भाषा के विकास में महाकवि विद्यापति की शृंगारिक रचनाओं के जबरदस्त योगदान का उल्लेख करते हुए मंगलवार को बताया कि महाकवि की शृंगारिक रचनाओं में मर्यादा का उल्लंघन कभी नहीं हुआ इसलिए उनके नायक-नायिका समाज को मर्यादा का पाठ पढ़ाते नजर आते हैं।
डॉ. शांतिनाथ सिंह ठाकुर ने स्वयंसेवी संस्था डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन एवं नागेंद्र झा महिला महाविद्यालय के मैथिली विभाग के तत्वावधान में आयोजित ‘विद्यापतिक रचनाओं में शृंगार रस’ विषयक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि विद्यापति ने शृंगारिक रचनाओं में संयोग एवं वियोग दोनों ही पक्षों का उत्कृष्ट और अनुपम वर्णन किया है। उनका शृंगार वर्णन मानवीय जीवन के अत्यधिक निकट है। उनकी रचनाएं पढ़कर आज भी लोग झूम उठते हैं और नाचने लगते हैं। अपनी शृंगारिक रचनाओं में उन्होंने कहीं भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया है और उनके नायक-नायिका समाज को मर्यादा का पाठ पढ़ाते हैं। इसलिए विद्यापति केवल शृंगार रस के ही कवि नहीं हैं। उनके साहित्य में भक्ति, व्यावहारिक एवं शृंगार का अद्भुत मिलन मौजूद है।
लेखक ने कहा कि मैथिली के कवि होते हुए भी पूरे भारत में विद्यापति की रचनाएं पढ़ी जाती हैं। उन्हें अपना कवि कहने के लिए तीन-तीन भाषाओं में छीना-झपटी चल रही है, लेकिन वस्तुत: वह मैथिली के कवि हैं। शृंगारिक गीत विद्यापति ने विशेष परिस्थितियों में लिखे हैं, जो उनकी प्रसिद्धि का आधार हैं और इसका अनुकरण अन्य कवियों ने भी किया है। महाविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. अर्पण झा ने कहा कि शृंगार रसराज है और साहित्य में नौ तरह के शृंगार का वर्णन है। शृंगार का स्थायी भाव रति है और इसके वर्णन में मैथिल कोकिल विद्यापति को महारथ हासिल है। रस के सभी भावों का वर्णन विद्यापति के काव्य में है और इसी कारण से ग्रिएर्सन ने इन्हें मिस्ट्रियस माना है। शृंगार ही शृंगार रचनाओं में दिखता है लेकिन वह भक्ति के कवि भी हैं। वहीं, प्रो. विद्यापति झा ने कहा कि सरसता के कवि विद्यापति का राधा-कृष्ण वर्णन अद्भुत है और वह केवल मैथिली साहित्य में ही नहीं, हिंदी साहित्य में भी ख्याति प्रसिद्ध है। उनका शृंगारिक वर्णन जड़-चेतना को भुला देता है। डॉ. रंजना झा ने बताया कि अभिसार, मिलन, विरह, भक्ति का जैसा संगम विद्यापति की रचनाओं में उपस्थित है वैसा किसी अन्य कवि में नहीं मिलता। डॉ. रेणु झा ने बताया कि जयदेव से प्रेरित रहे विद्यापति की रचनाएं शृंगार तत्व के कारण ही मैथिल लोगों के कंठ में बसी हुई हैं। यह विद्यापति की शृंगार क्षमता ही है जिसके कारण नायिका राधा भी स्वयं को माधव मान लेती हैं। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ. ऋषि कुमार राय ने कहा कि मैथिली भाषा की प्रसिद्धि का आधार रहे विद्यापति ने अपने काव्य के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर करारा प्रहार किया है और उनका सही मूल्यांकन तभी संभव है, जब केवल इन्हें शृंगारिक चश्मे से नहीं देखा जाए। आज भी विद्यापति के पद्य हर शुभ अवसर पर घर-घर गाये जाते हैं।

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