बच्चों को कोविड-19 के बारे में कैसे बताएं?

कोरोना वायरस का संक्रमण दुनिया भर में फैलने की वजह से बहुत से लोग इस बीमारी के ख़तरों को लेकर चिंतित हैं। ज़ाहिर है ऐसे मुश्किल वक़्त में बच्चे सलाह और मदद के लिए अपने मां-बाप की ओर उम्मीद भरी नज़रों से निहारते हैं। ऐसे में अगर आपके बच्चे इस वायरस के संक्रमण की वजह से परेशान हैं, तो आप उनसे इस बारे में कैसे बात करें?
बच्चों को भरोसा दें
विशेषज्ञों का कहना है कि, ‘आप को अपने बच्चे की चिंता दूर करनी होगी। उसे बताना होगा कि कोरोना वायरस वैसा ही वायरस है, जैसा वायरस आप को खांसी-जुकाम होने या डायरिया और उल्टी होने पर हमला करता है।’ विशेषज्ञ मानते हैं कि अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ इस मुद्दे पर, खुल कर ईमानदारी से बात करना चाहिए। विशेषज्ञों के भी अपने बच्चे होते हैं। वे उनसे इस बारे में बात करते हैं। साथ ही वे उन अभिभावकों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रेरित करते हैं, जो इलाज के लिए उनके पास आ रहे हैं।
बच्चों के मनोचिकित्सक मानते हैं कि कोरोना वायरस जैसे हर बड़े मसले पर बच्चों से बात कैसे करनी है, ये इस बात पर निर्भर करता है कि उनकी उम्र कितनी है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि, ‘छोटे बच्चे, ख़ास तौर से सात या छह बरस से कम उम्र के बच्चे अपने आस-पास ऐसे मसलों पर होने वाली चर्चा से खीझ जाते हैं क्योंकि उनके मां-बाप भी इसी बारे में उनके आस-पास चर्चा कर रहे होते हैं। बच्चों के लिए ये सब बहुत डरावना हो सकता है।’ छोटे बच्चों के लिए मनोचिकित्सकों ने सलाह दी है कि, ‘सबसे पहले तो आप अपने बच्चों को आश्वासन दीजिए। आप को पता नहीं है कि क्या होने वाला है। लेकिन, बच्चों को ये बताएं कि वो ठीक रहेंगे। आप सब ठीक रहेंगे। कुछ लोग बीमार होंगे, पर ज़्यादातर लोगों को इससे कुछ नहीं होगा।’
व्यावहारिक क़दम
मनोचिकित्सकों का कहना है कि हालांकि आप को पता नहीं कि आपके बच्चे को संक्रमण होगा या नहीं। पर, बेहतर होगा कि आप आशावादी रहें। बेवजह की फ़िक्र करके परेशान न हों। वो ये भी कहते हैं कि बच्चों को सिर्फ़ भरोसा देने भर से काम नहीं चलेगा। आप को उन्हें सशक्त बनाना होगा। सशक्त बनाने का मतलब ये है कि उन्हें ये बताना होगा कि वो कौन से ऐसे क़दम उठाएं, ताकि वो संक्रमित होने के ख़तरों को टाल सकें। साथ ही उन्हें ये एहसास भी हो कि चीज़ें उनके अपने हाथ में हैं।
बचाव
लेकिन, बच्चों को केवल स्वच्छता की अच्छी बातों का सबक़ याद दिलाने का मतलब केवल उनकी चिंताएं दूर करना भर नहीं है। छोटे बच्चों में अक्सर क़ुदरती तौर पर बहुत कौतूहल होता है। वो सवाल पूछते रहते हैं। वो चीज़ें छूते हैं और खाना-पानी दूसरों से शेयर करते हैं। ​​विशेषज्ञों के अनुसार इसका ये मतलब होता है कि बच्चे आम तौर पर संक्रमण फैलाने का बहुत बड़ा ज़रिया होते हैं। और हमें उन्हें शुरुआत से ही ये बहुत महत्वपूर्ण सबक़ सिखाते रहने चाहिए। बच्चों को साफ़-सफ़ाई के असरदार तरीक़े बताते रहने से आप पूरे समुदाय की सुरक्षा में योगदान दे सकते हैं।
बच्चों को फ़ेक न्यूज़ से बचाएं
डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों की चिंता बढ़ाने का सबसे बड़ा ज़रिया उनके मां-बाप ही हो सकते हैं। क्योंकि छोटे बच्चे अक्सर अपने मां-बाप से प्रभावित होते हैं। और अगर वो ये देखते हैं कि उनके माता-पिता चिंतित हैं, परेशान हैं। और वो अपने मां-बाप को अपने दोस्तों से फ़िक्र भरी बातें करते सुनते हैं, तो छोटे बच्चे उस वजह से अक्सर परेशान हो जाते हैं। अभिभावकों को अपने बच्चों के आस-पास रहते हुए अपने बर्ताव पर बहुत सावधानी बरतनी चाहिए।
किशोरों से कैसे संवाद करें?
किसी संक्रमण को लेकर किशोर उम्र बच्चों से बात करने का तरीक़ा अलग होता है। क्योंकि, वो दुनिया की ख़बरों के लिए अपने मां-बाप पर कम निर्भर होते हैं। उन्हें ज़्यादातर जानकारियां अपने दोस्तों से मिलती हैं।
डॉक्टर कहते हैं कि किशोरों के पास सूचना का अपना अलग नेटवर्क होता है। वो अपने हम उम्र साथियों पर ज़्यादा निर्भर करते हैं। लेकिन, किशोरों के साथ दिक़्क़त ये होती है कि वो ज़्यादा व्यवहारिक होते हैं। किसी 14 बरस के बच्चे को ये कहने से काम नहीं चलेगा कि सब ठीक-ठाक है। परेशान होने की बात नहीं है। क्योंकि जब आप उनसे ऐसा कहेंगे, तो वो पलट कर ये कहेंगे कि ‘आप को कुछ पता ही नहीं है।’ इसीलिए किशोर उम्र बच्चों के साथ संवाद में मुश्किल आती है। वे आप की हर बात को आसानी से मंज़ूर नहीं करते। हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि एक बात सभी बच्चों पर लागू होती है, भले ही वो किसी भी उम्र के हों। सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप उनके लिए कैसा माहौल तैयार करते हैं। आप को बच्चों को इतना खुलापन देना चाहिए, जिसमें उन्हें अपने मन की हर बात खुल कर कहने की आज़ादी हो। n

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