नवीन कारणों से बढ़ रहे डायबिटिक

भारत ही नहीं, दुनिया में जिस तेजी से शुगर पीडि़तों की संख्या बढ़ रही है उससे सभी चकित हैं। पहले वंशानुगत एवं अधिक आयु व धनाढ्यों को मधुमेह की बीमारी से ग्रस्त पाया जाता था किंतु वर्तमान काल में मधुमेह रोगियों की संख्या बढ़ने या नए शुगर पेशेंट बनाने में कई अन्य कारण सहायक हो रहे हैं। पेन्क्रियाज की कार्यक्षमता में कमी आने के बाद शुगर पीड़ित पाए जा रहे हैं। आधुनिक संसाधनों के कारण आरामपसंद पीढ़ी मधुमेही बन रही है। आधुनिक खानपान, फास्ट फूड, ड्रिंक एवं प्रोसेस्ड फूड कैलोरी से भरपूर होने के कारण यह सेवनकर्ताओं को डायबिटिक बना रहे हैं। हृदय रोगियों की संख्या बढ़ती रही है जो आगे चलकर शर्करा पीड़ित रोगी बनते जा रहे हैं। मोटापा पीड़ित एवं नवधनाढ्य भी इसके रोगी बन रहे हैं। प्रदूषण की अधिकता भी मधुमेह की दिशा में ले जा रही है।
दवाओं को तोड़कर खाना ठीक नहीं
सभी दवा निर्माता दवा में मिले रसायनों एवं उसकी क्रिया को देख उसे टिकिया, कोटेड या कैप्सूल अथवा पाउडर एवं लिक्विड फार्म में निर्माण करते हैं। डाक्टर भी रोगी की आयु व प्रकृति के अनुसार दवा सुझाते हैं। ऐसी दवाओं को तोड़कर खाने, पीसकर खाने या किसी के साथ मिलाकर खाने से उसका प्रभाव करने का रूप बदल जाता है अथवा विपरीत या अन्य प्रतिक्रिया करती है। दवाओं का तेज रसायन नुकसान करता है। साइड इफेक्ट पैदा करता है अथवा विकृति पैदा करता है। बच्चों को दी जाने वाली अधिकतर दवाएं तरल रूप में शक्कर मिश्रित होती हैं। कैप्सूल पेट के अंदर जाकर खुलता एवं घुलता व प्रभाव करता है। इस कैप्सूल के भीतर दवा चूर्ण रूप में होती है। टिकिया पेट के अंदर जाकर घुलती है एवं दो घंटे में उसका पूरा प्रभाव दिखता है। कुछ दवाएं टिकिया के रूप में शुगर कोटेड होती हैं। ये भी पेट के अंदर जाकर घुलती व प्रभाव दिखाती हैं अतएवं डाक्टर के सुझाए अनुसार ही दवा लें एवं शीघ्र स्वास्थ्य लाभ पाएं।

मोटापा तरह-तरह का
मोटापा भी कई प्रकार का होता है। बचपन का मोटापा माता-पिता एवं वंशानुगत कारणों से तो होता ही है, साथ ही बच्चे को मां से भरपूर दूध मिलने या अधिक दिनों तक मां का दूध पीते रहने के कारण वह बच्चा मोटा हो जाता है। बच्चा अधिक दवाओं के कारण भी मोटा होता है। बचपन में अधिक पौष्टिक खान-पान, दुलार की अधिकता एवं खेलकूद की कमी के कारण बच्चे मोटे हो रहे हैं। हाइपोथायराइड भी सबको मोटा बना देता है। गर्भवती महिलाएं कुछ मोटी दिखती हैं। किडनी की कार्यक्षमता में कमी एवं नमक की अधिकता भी पानी रोककर कुछ मोटा बनाती है। बड़े जब आवश्यकता से अधिक खाते हैं तो मोटे हो जाते हैं। सिटिंग जॉब वाले मोटे हो जाते हैं। युवतियां विवाह उपरांत या नौकरीपेशा बनकर निश्चिंत जीवन जीने के कारण मोटी हो जाती हैं। मेनोपाज के बाद कुछ महिलाएं मोटी हो जाती हैं। बाहरी मोटापा सबको दिखता है किंतु शरीर के भीतर में हृदय, लिवर व पेन्क्रियाज भी मोटा होता है। ऐसे भीतरी मोटापे का शिकार दुबला पतला व्यक्ति भी हो सकता है। निष्कर्षत: सभी के मोटापे में अंतर होता है और मोटापे की अधिकता थुलथुला बना देती है।

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