क्यों होते हैं ये रोग?

बीमारी होती है ओर उसका उपचार होता है। बीमारी होने और उपचार होने के बीच के समय में रोगी को अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है जिसमें शारीरिक एवं आर्थिक परेशानी दोनों ही शामिल होते हैं । रोग होने के कारणों को जान लिया जाये और हिफाजत बरती जाए तो संभवत: बीमार होने से बचा जा सकता है। कुछ गंभीर बीमारियों के होने के कारणों को यहां बताया जा रहा है।
हैपेटाइटिस:- हेपेटाइटिस की यह बीमारी विषाणुओं द्वारा सिर्फ मनुष्य में ही फैलती है और वह भी मुख्यत: खून के माध्यम से ही।
रक्तदान अर्थात खून लेते या देते समय, संक्र मित खून के उत्पाद के उपयोग से, अंग प्रत्यारोपण के दौरान सावधानी न बरतने से, संक्र मित इंजेक्शन (सुई) या ब्लेड या अन्य चीजों के कॉमन इस्तेमाल से, अनैतिक यौन सम्बन्धों के माध्यम से, मुख्यत: पुरूष होमोसेक्सुअल की स्थिति में, असुरक्षित या अधिक लोगों के साथ यौन संबंध रखने पर, विभिन्न शारीरिक स्रावों जैसे वीर्य, योनि स्राव (वेजाइनल) या घाव के स्राव से तथा हारिजेन्टल संक्र मण द्वारा स्केबीज, इम्पेटिगो, खरोंच या रगड़ द्वारा, स्नानघरों, सामूहिक तौलियों एवं बिस्तरों या कपड़ों के उपयोग करने से हेपेटाइटिस ‘बी’ का संक्र मण हो जाता है।
साइनोसाइटिस:- यह नाक संबंधी अर्थात् श्वसन संस्थान संबंधी एक आम बीमारी है जिसे असाध्य प्रतिश्याय के नाम से भी जाना जाता है। इस बीमारी में रोगी के नाक से निरन्तर पीले रंग का लसलसा कफ निकलता रहता है। इस बीमारी से पीड़ित अधिकांश रोगी अपने सिर में तीव्र वेदना की भी शिकायत करते हैं । यह भी एक संक्र मण जन्य बीमारी ही है।
यद्यपि साइनोसाइटिस एक संक्रामक जीवाणु द्वारा प्रदत्त रोग है किन्तु इसकी दशा कई अन्य कारणों से भी जन्म ले सकती है जैसे नाक की झिल्ली पर बार-बार विषाणुओं का आक्र मण, बीड़ी, सिगरेट, चिलम आदि का नियमित सेवन, एलर्जी, विषैले धुएं वाले इलाकों में रहना, प्रदूषित हवा ग्रहण करना, ज्यादा ठंडी एवं सूखी हवा के सम्पर्क में आना और निरन्तर मानसिक तनाव भरी जिन्दगी जीना।
इसके अलावा साइनोसाइटिस की शुरूआत सफाई के लिये इस्तेमाल किए जाने वाले रसायनों, भवन निर्माण सामग्री, फफूंदी मारने वाली दवाओं, खरपत नाशक दवाओं (पेस्टीसाइड्स), रंग रोगनों, (पेन्ट्स) और गलीचों में इस्तेमाल किये जाने वाले विलायकों, फोटो कॉपिंग में इस्तेमाल किये जाने वाले रसायनों, तम्बाकू, जर्दा रेडॉन, कीटाणु आदि के बार-बार हमलों से भी हो सकती है।
हिस्टीरिया:- यह एक उलझनपूर्ण तथा विचित्र लक्षणों वाला मानसिक रोग है जिसका अधिकतर शिकार महिलाएं हुआ करती हैं। हिस्टीरिया प्राय: मन की उस स्थिति में उत्पन्न होता है जब शरीर में सुपोषक आहार तत्वों के प्रभाव से जोश एवं कामनायें घुमड़ रही होती हैं लेकिन किसी कारणवश वे लालसायें भंग हो जाएं या अतृप्त रह जायें या जबरन दबा दी जायें और उसी समय झंझट की कोई बात भी सामने आ जाए।
युवतियों में मासिक धर्म सम्बन्धी दोष, मासिक का न आना या रूक जाना, कष्ट के साथ मासिक का आना, प्रदररोग, वन्ध्यत्व, आदि के कारण सामाजिक तिरस्कार से हीन भावना से ग्रस्त युवतियां के मन तथा मस्तिष्क पर आघात पहुंचता है। परिणामस्वरूप हिस्टीरिया का दौरा प्रारंभ हो जाता है।
सेक्सी एवं अश्लील साहित्यों को पढ़ते रहना, प्रेम प्रसंगों में असफलता, पेट में कीड़े, कब्ज, आलस्य, काम भावनाओं का दमन, मानसिक आधात, शोक, चिन्ता, वियोग, पति का निष्ठुर स्वभाव, पति का अधिक दिनों तक बाहर रहना, अनमेल विवाह, परिवारी जनों से अपमानित होते रहना, तिरस्कार मिलना, बलात्कार, पति द्वारा बलपूर्वक संभोग, वैधव्य जीवन, पति का रोगी या दुर्बल होना, गर्भाशय की विकृति, दांपत्य प्रेम का अभाव आदि अनेक कारण ऐसे होते हैं जो स्त्रियों में हिस्टीरिया रोग को उत्पन्न कर सकते हैं।
ल्यूकोरिया:- इसे श्वेतप्रदर या योनि मार्ग से सफेद पानी आना भी कहा जाता है। यह स्त्रियों की आम बीमारी है। यह रोग चौदह वर्ष की लड़की से लेकर बूढ़ी स्त्रियों तक को हो सकता है। इस बीमारी का उत्पादक कारण यूं तो एक प्रकार के बैक्टीरिया होते हैं जो योनि के अन्दर गन्दगी में वृद्धि करके इसको पैदा करते हैं। इसके अतिरिक्त यौनांगों की अच्छी तरह सफाई न करना, शारीरिक कमजोरी, यौनांगों में सूजन, जोड़ों का दर्द तथा सूजन, जल्दी – जल्दी गर्भ ठहरना, मासिक समय पर न होना, तीव्र औषधियों का सेवन, कब्ज, अजीर्ण, मधुमेह, छोटी उम्र में गर्भ धारण करना, अत्यधिक गरिष्ठ भोजन करना, तेज मिर्च मसाले, खटाई का अधिक प्रयोग, शारीरिक श्रम न करना, आदि अनेक कारणों से ल्यूकोरिया की परेशान करने वाली बीमारी हो जाया करती है।
स्वप्नदोष:- यह युवावस्था की एक बीमारी है। यह प्राय: 15 से 25 वर्ष की उम्र वालों को अधिक होता है। कब्ज, गुदाकृमि, मन्दाग्नि, अपचन, सुजाक, मधुमेह, पथरी, जलोदर, उपदंश, बवासीर, अजीर्ण, मानसिक तनाव, शोक, रात को अधिक जागना, दिन में देर तक सोना, शारीरिक श्रम न करना, अश्लील किताबों को पढ़ना, कामोत्तेजक दृश्य, फोटो आदि देखना, चाय, कॉफी, तले-भुने आहार, मांस, मदिरा, पान-मसाला, धूम्रपान, नशीली वस्तुओं के सेवन से यह रोग होने लगता है।

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