विकास का इंतजार कर रहा है औरंगाबाद का रढुआ धाम

औरंगाबाद : बिहार के औरंगाबाद जिले में ऐतिहासिक, पौराणिक और धार्मिक महत्व के रढुआ धाम को आज भी विकास का इंतजार है।
जिले के जम्होर पंचायत में बटाने और पुनपुन नदी के संगम स्थल पर स्थित इस धाम की काफी धार्मिक मान्यता है। धार्मिक और लोक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु कभी यहां प्रकट हुए थे और उन्होंने एक तपस्विनी पुनिया को आशीर्वाद दिया था, जिसके फलस्वरूप वह धरती पर पुनपुन नदी के रूप में प्रवाहित हुई। पुनपुन नदी को भगवान विष्णु के आशीर्वाद से पृथ्वी पर अवतरित होने के प्रमाण कई धार्मिक ग्रंथों में उपलब्ध है। इसीलिए, पुनपुन नदी को आदि गंगा कहा गया है। मान्यता है कि पुनपुन और बटाने नदी के संगम पर ही पुनिया नामक तपस्विनी ने भगवान विष्णु की आराधना की थी, जिसके बाद भगवान विष्णु प्रकट हुए थे और उसे आशीर्वाद दिया था। जिस स्थल पर भगवान विष्णु के प्रकट होने की बात कही जाती है वहां लंबे अरसे से पूजा-आराधना होती रही थी। बाद में कुछ श्रद्धालुओं ने इस संगम स्थल पर भगवान विष्णु का एक मंदिर बना दिया जो आज भी मौजूद है और इसे रढुआ धाम मंदिर कहा जाता है। हालांकि इस परिसर में कालांतर में भगवान सूर्य और अन्य देवी-देवताओं के भी मंदिर बन गए पर वस्तुत: यह विष्णुधाम ही कहा जाता है। धाम में रामसेतु का एक पत्थर भी है जो पानी पर तैरता रहता है। कथा है कि भगवान राम ने ऐसे ही पत्थरों से लंका विजय के लिए पुल बनवाया था। ऐसा ही एक और पत्थर पटना के महावीर मंदिर में भी है। रढुआ धाम के रामशिला पत्थर को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं। आज भी कार्तिक में यहां विशाल मेला लगता है और लोग स्नान कर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं। पुनपुन और बटाने नदी के संगम पर हमेशा श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। पितृपक्ष में पहला पिंड पुनपुन नदी में दिया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा तथा अन्य धार्मिक अवसरों पर पुनपुन नदी में स्नान करना बेहद पुण्य फलदायक माना जाता है। रढुआ धाम मठ के पास काफी जमीन भी है, जिससे यहां भगवान विष्णु का राजभोग लगता रहा है। रढुआ धाम तक पहुंचने के लिए जम्होर स्थित अनुग्रह नारायण रोड रेलवे स्टेशन से एक पक्की सड़क का निर्माण किया गया है लेकिन इसकी मरम्मत की जरूरत है। अनुग्रह नारायण रोड रेलवे स्टेशन से रढुआ धाम की दूरी बमुश्किल दो किलोमीटर है लेकिन यहां सुविधाओं का घोर अभाव है। इस स्थल का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है। पुनपुन नदी के घाट अभी भी कच्चे हैं और वहां देखरेख और सफाई की कमी है। रढुआ धाम के आस-पास यात्री शेड और अन्य सुविधाएं नहीं हैं, जिससे श्रद्धालुओं को परेशानी होती है। कार्तिक मेले के दौरान आने वाले वाहनों के लिए भी पर्याप्त पार्किंग स्थल नहीं है और इकहरी सड़क होने के चलते भी लोगों को परेशानी होती है।
लंबे समय से यहां सड़क के चौड़ीकरण की बात की जा रही है। यदि इस पौराणिक धार्मिक स्थल का विकास हो तो पुनपुन और बटाने नदियों के संगम पर स्थित इस अत्यंत पवित्र माने जाने वाले स्थल पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में निश्चित तौर पर इजाफा होगा। वास्तविकता यह है कि बहुत कम लोग इस स्थल के बारे में जानते हैं और जिले के बाहर तो यह पूरी तरह गुमनाम ही है, जरूरत है इसका प्रचार प्रसार कर यहां पर्यटन सुविधाएं बढ़ाने की।
जम्होर के संगम खुटी विष्णु रढुआ का सूर्य मंदिर डेढ़ सौ वर्ष पुराना होने के बावजूद आकर्षक है। न्यास समिति के सदस्य मंदिर को सजाने का कार्य करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ लगती है। मंदिर पुनपुन नदी के तट पर स्थित है जहां छठव्रती नदी में स्नान कर भगवान सूर्य को अर्घ्य देते हैं। बताया जाता है कि जो श्रद्धालु सच्चे दिल से पूजा करते हैं उनकी हर मनोकामना पूरी होती है। ग्रामीणों की मानें तो इस मंदिर का निर्माण पंजाब के बाबा हंस राज उर्फ खाकी बाबा द्वारा कराया गया था। बताया जाता है कि पंजाब से खाकी बाबा रढुआ धाम जम्होर में आकर रहने लगे। उन दिनों यह स्थल वीरान हुआ करता था। यहां आने से लोग कतराते थे। जमीन कारा के नवाब साहब की बताई जाती है। बताया जाता है कि जब कारा गांव में आग लग गयी तो बुझ नहीं पा रही थी तो उस समय बाबा को बुलाया गया। बाबा के पहुंचते ही आग बुझ गयी तब नवाब साहब ने बाबा को कुछ मांगने की इच्छा जताई। तभी खाकी बाबा ने कहा कि वह जिस जमीन पर रहते थे, वहां पर जमीन दे दें ताकि मंदिर का निर्माण कराया जा सके। उसी समय नवाब साहब ने दानस्वरूप मंदिर के लिए जमीन दे दी तभी खाकी बाबा ने वहां पर मंदिर निर्माण की नींव डाली और सभी के सहयोग से भगवान विष्णु, भगवान भास्कर, भगवान शंकर, भगवान महावीर समेत कई भगवान के मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर न्यास समिति के अधीन कर दी गयी है। अध्यक्ष रामबचन तिवारी, कोषाध्यक्ष सुरेंद्र प्रसाद गुप्ता, मंदिर के महंत नंद ब्रह्मचारी, सदस्य अजीत कुमार सिंह के साथ अन्य ग्रामीण मंदिर की देख-रेख करते हैं। ग्रामीणों की मानें तो मंदिर के निर्माणकर्ता खाकी बाबा की समाधि परिसर में स्थित है।

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