भवानीपुर जीत लिया अब दिल्ली जीतने की तैयारी

केंद्रीय राजनीति की बड़ी खिलाड़ी बनने में जुटी ममता
कांग्रेस की कलह का फायदा उठागी तृणमूल
सोनू ओझा 
कोलकाता : राजनीतिक जंग की शुरुआत हुई थी बी से भवानीपुर को लेकर जिसका अंत बी से भारतवर्ष की जीत पर पूरा करना है। इस लक्ष्य में ममता बनर्जी भवानीपुर तो जीत चुकी है, वह भी रिकॉर्ड मार्जिन से। अब उनकी राह भारतवर्ष की जीत पर है, जिसकी तैयारियों में वह काफी पहले से ही जुटी हुई है। नंदीग्राम में हार के बाद से ही ममता ने साफ कर दिया था कि उनका लक्ष्य दिल्ली की सत्ता में बैठी भाजपा को हराना है। इस मिशन में तृणमूल का कायापलट तक किया गया, भतीजे अभिषेक बंद्योपाध्याय को पार्टी की कमान दी गई, राष्ट्रीय राजनीति में पार्टी का विस्तार कार्य शुरू किया गया। राष्ट्रीय राजनीति में क्या गतिविधियां हो रही हैं इस पर खुद ममता बनर्जी नजर रखने लगी। इस बीच जो चौंकाने वाली बात रही वह तृणमूल का या कहें खुद ममता बनर्जी का कांग्रेस पर वार करना रहा जो बदस्तूर जारी है। जानकारों की माने तो ममता बनर्जी और उनकी पार्टी का बदला बदला सा रूप दरअसल कवायद है मोदी सरकार के सामने खड़े होने वाले विपक्ष में प्रबल चेहरे को तैयार करने का।
कांग्रेस पार्टी बड़ी है लेकिन चेहरा ममता का प्रबल है
जानकारों की मानें तो देश की राजनीति में कांग्रेस एक बड़ी पार्टी है लेकिन दमदार नेता के तौर पर कोई मुखर है तो वह ममता बनर्जी है। विधानसभा चुनाव में जिस तरह तृणमूल ने भाजपा को 77 सीटों पर समेटा उसे देख कर विपक्ष का एक खेमा भी मानता है कि ममता बनर्जी ही वह चेहरा है जो मोदी को सीधे-सीधे टक्कर दे सकती हैं। इसके अलावा खुद पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बंदोपाध्याय ने जिस तरह कांग्रेस पर हमला बोला उसे देखते हुए अंदाजा लगाया जा सकता है कि कांग्रेस के सामने तृणमूल को प्रबल दिखाने की पूरी चेष्टा की जा रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस के भीतर जिस तरह द्वंद सामने आ रहे हैं उसका भी एक तरह से फायदा तृणमूल को ही मिलता दिख रहा है क्योंकि दूसरे राज्यों में जहां तृणमूल अपना संगठन तैयार कर रही है वहां कांग्रेस के खफा नेता तृणमूल की तरफ अपना रुख कर रहे हैं वह भी यह कहकर कि सबसे निडर और केंद्र की भाजपा सरकार को चैलेंज देने का दम ममता बनर्जी रखती है।
केंद्र राजनीति पर नजर रखने के लिए बनी संसदीय दल की नेता
2024 को ध्यान में रखते हुए ही ममता बनर्जी अपने राजनीतिक फैसले ले रही है। यही वजह है कि उन्होंने खुद को संसदीय दल का नेता चुना ताकि देश में हो रही राजनीतिक हलचल में तृणमूल को किस तरह की बयानबाजी करनी है, किस तरह की रणनीति तैयार करनी है वह खुद कर सके। इसके अलावा एक सीधा जरिया है ममता बनर्जी को दिल्ली में अपनी सक्रियता बढ़ाने का जिसे लेकर वह कह चुकी है कि हर महीने उनका राजधानी का दौरा लगा रहेगा। संसदीय दल का नेता बनने के बाद ही ममता बनर्जी केंद्र सरकार की हर उन बैठकों में मौजूद रह सकेंगी जिसमें संसदीय दल के नेता हिस्सा लेते हैं। इस वजह से वह एक मजबूत विपक्ष के रूप में अपनी उपस्थिति भी दर्ज कराने में सफल रहेंगे।
किसान से लेकर पेगासस मामले पर पूछा करारा सवाल
केंद्र सरकार हो या फिर भाजपा के नेता ममता बनर्जी एक मौका नहीं छोड़ती है उनसे सवाल जवाब करने का फिर वह मामला किसान से जुड़े आंदोलन का हो या फिर पेगासस स्पाइवेयर विवाद जिसने अच्छा खासा देश में तूल पकड़ा था। ममता हमेशा केंद्र को इन मामलों के जरिए घेरने में लगी रहती है। अपने हालिया बयानों में भी ममता ने केंद्र को तंज कसते हुए पर सवाल पूछा साथ ही इसके जांच की बात कही। ममता ने यह तक कहा कि पेगासस के जरिए केंद्र सब पर नजर रखना चाहता है जो गलत है।
ममता के मुखर होने की आदत उन्हें बाकी नेताओं से अलग रखती है। कहना गलत न होगा कि जिस तरह देश में मोदी का क्रेज है वैसे ही बंगाल में ममता बनर्जी लोगों के जेहन में रहती हैं। अब बंगाल से बाहर अपनी इस छवि को वह किस हद तक बरकरार रख पाएंगी यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

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