मतदान करना है जरूरी, लेकिन चाय श्रमिक किसे देंगे अपना वोट?

-चाय श्रमिकों को जनप्रतिनिधियों की नहीं है जानकारी
-अब तक सुकना चाय बगान में प्रचार के लिए नहीं पहुंचे प्रत्याशी
सिलीगुड़ी: चाय बगान तथा उसमें काम करने वाले चाय श्रमिकों को लेकर राजनीति आम है। चुनाव के दिनों में इन चाय श्रमिकों का इस्तमाल केवल बैंक के रूप में किया जाता है। चुनाव बीत जाने के बाद इन चाय श्रमिकों से किसी को कोई लेना देना नहीं है। सिलीगुड़ी से सटे माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी विधानसभा के सुकना चाय बगान के श्रमिक आज भी कई सुविधाओं से वंचित है। आरोप है कि बगान के स्वास्थ्य केन्द्र की हालत जर्जर है। इलाज के लिए चाय श्रमिकों को जिला अस्पताल तथा मेडिकल कॉलेज पर निर्भर होना पड़ता है। चाय श्रमिकों का इस्तमाल राजनीतिक पार्टी के लोग वोट बैंक की तरह करते है। 20 से 25 वर्षों तक काम करने के बाद भी चाय बगान में महिला श्रमिकों का वेतन मात्र 177.50 रुपये है। उन लोगों को इस तरह से डराया धमकाया गया है कि अपनी समस्याओं को खुलकर लोगों के सामने नहीं रख सकते। चाय श्रमिकों के पास वोटर कार्ड तो है लेकिन चुनाव तथा मतदान के बारे में जागरूकता का अभाव है। विधानसभा चुनाव को लेकर भी चाय श्रमिकों में कोई खासा उत्साह नहीं है। वोटर कार्ड है बस इस लिए वोट डालने जाते है।
चाय श्रमिकों में चुनाव को लेकर जागरूकता जरूरी
कलस्टिना टेटे ने बताया कि 21 वर्षों से सुकना चाय बगान में काम कर रही है। कई बार मतदान किया है। मतदान केन्द्र में जाकर एक बटन दबाती है। प्रत्याशी कौन है? उनके मतदान का उद्देश्य क्या है? पूछने पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। अपने क्षेत्र के पूर्व विधायक का नाम तक वे नहीं जानती। क्योंकि आज तक चाय श्रमिकों का हाल चाल पूछने के लिए इलाके में कोई नहीं आया। उन्होंने बताया कि चाय बगान में पत्ता तोड़ने तथा 12 दिन के अंतराल में मिलने वाले दैनिक मजदूरी 2130 तक ही उन लोगों का जीवन सीमित है। बाहर के दुनिया में क्या चल रहा है। चाय बगान में इस बारे में उनलोगों को खबर तक नहीं मिलती है।
वोट मांगने के लिए नहीं आता कोई प्रत्याशी
जुबलिना ने बताया कि सुकना चाय बगान में इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। उस चाय बगान में एक स्वास्थ्य केन्द्र है लेकिन उसमें चिकित्सक, नर्स, कंपाउंडर का अभाव है। उन्होंने बताया कि पिछले दस वर्षों से बागान में स्वास्थ्य व्यवस्था का यही हाल है। जबकी राज्य में बड़े बड़े अस्पताल खोले जा रहे है। छोटी मोटी समस्या होने पर फार्मासिस्ट ही उनका इलाज करते है। उन्होंने बताया कि इलाज के लिए उन लोगों को अस्पताल तथा मेडिकल कॉलेज पर निर्भर रहना पड़ता है। अपनी बात वे किसी को नहीं बता सकते। जनप्रतिनिधि भी उनकी समस्याओं को सुनने के लिए नहीं आते। आलम ये है कि चुनाव के मौसम में अभी तक एक भी प्रत्याशी का चरण सुकना चाय बगान में नहीं पड़ा है।
इलाके में पेयजल तथा आंगनबाड़ी में शिक्षकों का अभाव
देबूलाल ने बताया कि इलाके में सबसे बड़ी समस्या शुद्ध पेयजल की है। पानी लाने के लिए उस चाय बगान के लोगों को बाहर जाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इलाके में केवल एक आगंनबाड़ी केन्द्र है। जहां एक से लेकर 4 तक कक्षा है। उस आंगनबाड़ी केन्द्र में शिक्षकों का अभाव है। देबूलाला के अनुसार आंगनबाड़ी केन्द्र में दो शिक्षकों पर चाय श्रमिकों के बच्चों को शिक्षित करने की जिम्मेदारी है। उच्च शिक्षा के लिए चाय श्रमिकों के बच्चों को बाहर जाना पड़ता है। पूछे जाने पर देबूलाल ने कहा मतदान जरूरी है। चुनाव कब है इस बारे में उन लोगों को नहीं मालूम। अपनी समस्या को जनप्रतिनिधि तक पहुंचाने का उनके पास कोई जरिया नहीं है।
राजनीतिक रैली व सभा में भीड़ बढ़ाने के लिए चाय श्रमिकों का इस्तमाल
दाबरियेल केरकेट्टा ने कहा कि शहर से बागान को जोड़ने वाला मुख्य सड़क जर्जर है। सालबाड़ी जाने का एकमात्र ब्रिज की टूट गया है। उन्होंने बताया कि लोग वहां किस हालत में रह रहे है। इससे किसी भी राजनीतिक दल को कोई मतलब नहीं। जब कोई राजनीतिक पार्टी की रैली तथा सभा होती तो बागान से लोगों को गाड़ियों में भर भर कर ले जाया जाता है। उन्होंने कहा कि राज्य में चुनाव चल रहा है। उनके क्षेत्र में किस पार्टी से कौन खड़ा हुआ है, जनता नहीं जानती। चाय बगान के भोले भाले लोगों का कहना है कि समस्या का समाधान करने वालों को ही अपना वोट देंगे।
वोट देना जरूरी है इस वजह से करेंगे मतदान
शंकर साहू ने बताया कि चाय बागान में श्रमिक का काम करते है। उन्हें 202 रूपये दैनिक मजदूरी मिलता है। चाय बागान में महिलाओं की तुलना में पुरूष श्रमिकों की मजदूरी थोड़ी ज्यादा है। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले सरकार की ओर से चाय श्रमिकों को आवास देने की बात कही गई थी। आज भी चाय बगान के लोग इससे वंचित है। उन्होंने बताया कि वोट मांगने उनके पास अभी तक कोई नहीं आया। मतदान करने के बाद भी उनकी समस्याओं का सामाधान हो पायेगा? इसकी कोई आशा नहीं है। वोट देना जरूरी है। इस वजह से ही 17 अप्रैल को मतदान करेंगे।

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