यूपी चुनाव : 22 की नहीं 2024 की तैयारी में जुटी है तृणमूल

प्रदेश के कई हिस्सों में अभी तक जमीन तैयार नहीं कर पायी है तृणमूल
ललितेश त्रिपाठी का फोकस विधायक बनना कम, आम चुनाव पर अधिक
सोनू ओझा
कोलकाता : राजनीति में दिल्ली तक पहुंचने का रास्ता कहीं से शुरू होता है तो वह उत्तर प्रदेश है, जहां से कई नामचीन राजनेताओं ने दिल्ली की राजनीति में नाम दर्ज किया है। राष्ट्रीय राजनीति में विस्तार कर रही ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ने कुछ महीने पहले ही उत्तर प्रदेश की पॉलिटिक्स में कदम रखा है। हालांकि वहां एंट्री के साथ ही पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने यह साफ कर दिया कि वे 2022 के विधानसभा चुनाव में वहां दांवेदारी दर्ज नहीं करने वाली हैं। इतना जरूर है कि उनका विरोध बंगाल की ही तरह उत्तर प्रदेश में भी भाजपा के खिलाफ ही होगा तथा समाजवादी पार्टी यानी अखिलेश यादव को ममता अपना समर्थन दे रही हैं। उनके लिए ममता खुद वहां प्रचार करने भी जाने वाली हैं। इस बीच बड़ा सवाल आता है कि आखिर महीनों तक वहां माहौल बनाने के बाद भी तृणमूल वहां के चुनावी समर में क्यों नहीं कूदी। पूर्व कांग्रेसी नेता ललितेश त्रिपाठी इस इंतजार में बैठे हैं कि समाजवादी पार्टी के समर्थन में ही उन्हें मिर्जापुर की सीट से चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा।
इस चुनाव में मौका न मिला तो ना सही, 2024 बाकी है
ललितेश त्रिपाठी से इस चुनाव में उनकी उम्मीदवारी को लेकर जब पूछा गया तो उन्होंने सन्मार्ग को बताया कि मैं तैयार हूं, अगर पार्टी हाई कमान सिग्नल देता है तो चुनाव में खड़े होंगे अगर मौका नहीं दिया जाता तो हमारी तैयारी 2024 के लिए होगी। त्रिपाठी ने कहा कि उत्तर प्रदेश एक बड़ा और महत्वपूर्ण राज्य है। पार्टी को जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करनी है। यह एक बड़ी जिम्मेदारी है जिसमें वक्त लगना लाजमी है। ऐसे में 2022 में चुनाव पर फोकस न कर 2024 पर ध्यान रखना ज्यादा जरूरी है।
बनारस और पूर्वांचल में सक्रियता बढ़ा रही तृणमूल
ललितेश त्रिपाठी का परिवार राजनीति में नया चेहरा नहीं है। उन्होंने दावा किया है कि बनारस से सटे 10 जिले (करीब 14 लोकसभा सीट, 80 विधानसभा सीट) और पूर्वांचल की 17 संसदीय सीट और 100 विधानसभा सीटों पर उनकी सक्रियता अच्छी मानी जाती है। मध्य यूपी और पश्चिम यूपी में तृणमूल नेता तलाश रही है, अगर साथ मिलता है तो संभव है वहां संभावनाएं भी बढ़ेंगी। देखने वाली बात है कि बंगाल में अपना दबदबा कायम रखते हुए तृणमूल उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी पैठ कितना जमा पाती है।

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