ट्रायल में देर बनी न्याय के लिए एक क्रोनिक व्याधि : हाई कोर्ट

कोलकाता : लंबे समय तक ट्रायल का लटके रहना न्यायिक प्रक्रिया के लिए एक क्रोनिक व्याधि बन गई है। एनडीपीएस एक्ट के मामले में एक जमानत याचिका पर सुनवायी करने के बाद हाई कोर्ट के जस्टिस जयमाल्य बागची और जस्टिस शुभ्रा घोष ने अपने आदेश में यह टिप्पणी की है।

इस तरह किसी को उसकी व्यक्तिगत आजादी से वंचित नहीं किया जा सकता है। यह एक संवैधानिक अधिकार है। डिविजन बेंच ने इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार को एक विस्तृत आदेश दिया है। डिविजन बेंच ने अपने आदेश में कहा है 2019 की एनसीआरबी रिपोर्ट के मुताबिक देश के जेलों में बंद कैदियों में 69.5 फीसदी विचाराधीन बंदी हैं। इन परिस्थितियों में यह आवश्यक है कि पांच साल या इससे अधिक समय से जेलों में बंद सभी विचाराधीन बंदियों को न्याय मिले।

जमानत पाना एक संवैधानिक अधिकार

एडिशनल सालिसिटर जनरल और हाई कोर्ट के पब्लिक प्रोसिक्यूटर को आदेश दिया जाता है कि पांच साल या इससे अधिक समय से एनडीपीएस एक्ट के तहत जेलों में बंद सभी विचाराधीन वंदियों के बारे में मामलों का हवाला देते हुए रिपोर्ट पेश करें। हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भी इस बाबत रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। एनडीपीएस एक्ट के तहत दायर मामलों में ट्रायल के लंबा खिंचने की वजह का जिक्र करते हुए डिविजन बेंच ने कहा है कि फोरेंसिक लैब की कमी, उनमें कर्मचारियों का अभाव और प्रोसिक्यूटर के संकट के कारण यह स्थिति बनी है। सुप्रीम कोर्ट लीगल एड कमेटी के निर्देश के मुताबिक प्रभावी और स्पीडी ट्रायल करना राज्य सरकारों की वैधानिक जिम्मेदारी है। इसका हनन नहीं किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को निजी आजादी का अधिकार है। अदालतों को मामूली हीलाहवाली से उपर उठना पड़ेगा।

फोरेंसिक लैब और कर्मचारियों की कमी एक प्रमुख कारण

डिविजन बेंच ने कहा है कि पांच साल से भी अधिक समय से जेलों में बंद विचाराधीन वंदियों के बारे में अगर हम सुप्रीम कोर्ट लीगल एड कमेटी की गाइड लाइन का अनुकरण नहीं करते हैं तो हम अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने में असफल रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट की डेहरी तक पहुंचने में नाकाम रहने वाले विचाराधीन वंदियों के जख्म पर मरहम लगाने में नाकाम रहेंगे।

इस गाइड लाइन का लब्बोलुआब ये है कि अगर अधिकतम सजा की आधी अवधि पूरी कर लेता है तो संविधान की धारा 14 और 21 के तहत उसे आजादी का अधिकार मिलना चाहिए। इस पर गौर करते हुए पिटिशनर सनवर अली को कुछ शर्तों के साथ डिविजन बेंच ने जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

 

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