सेकेंड वेव में मजबूत हुआ थ्रम्बोसिस इवेंट, हॉर्ट अटैक के मरीज बढ़े

पहले सात दिन बाद होती थी रक्त में थक्का जमने की परेशानी, अब 3-4 दिन बाद ही कई मरीज हो रहे शिकार
सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाताः आंकड़े बताते हैं कि 14 से 28 % अस्पताल में भर्ती कोरोना के रोगियों में डीवीटी या डीप ब्रेन थ्रम्बोसिस हो रहा है। वायरस संक्रमित शरीर में कई समस्याएं पैदा कर रहा है। डॉक्टर उस बारे में सभी को चेतावनी दे रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना सिर्फ फेफड़ों में संक्रमण का कारण नहीं बनता है। शरीर में रक्त के थक्के इस कोरोना के कारण घातक स्थिति हो सकते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि 14 से 28 % अस्पताल में भर्ती कोरोना के रोगियों में डीबीटी हो रही है। लोगों में शरीर के 2 से 5 % मामलों में आट्रेरियल थ्रम्बोसिस देखी जा रही है। वेस्ट बंगाल डॉक्टर्स फोरम की ओर से वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. कौशिक चाकी ने कहा कि पहले थ्रम्बोसिस इवेंट के मामले एक सप्ताह बाद मरीजों में नजर आते थे। हालांकि इस बार कई मरीजों में 3-4 दिन बाद ही ऐसा हो रहा है। ऐसे में कोविड संक्रमित मरीज में थ्रम्बोसिस इवेंट देखा जा रहा है। ऐसे में मरीज के फेफड़ के खून बहने की नली में क्लाट (थक्का) हो जा रहा है। यह भी हॉर्ट अटैक का कारण बन रहा है। उन्होंने कहा, “कोरोना में रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया में तेजी आती है। इस कारण शरीर के विभिन्न हिस्सों में रक्त के थक्के बन सकते हैं। उस बंद रक्त से दिल का दौरा पड़ने की संभावना बढ़ जाती है। साथ ही फेफड़ों को रक्त की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। हार्ट या ब्रेन अटैक की भी संभावना इस बार अधिक नजर आ रही है। ” कोरोना से उबरने के बाद भी यह समस्या बनी रह सकती है। “कई मामलों में, हमने अचानक दिल का दौरा पड़ने से कई मरीजों को मरते देखा है।
डॉ. चाकी ने कहा कि दरअसल वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद खुद को दोहराता है यानी कि सेकेंडरी इंफेक्शन की संभावना बनी रहती है। इसलिए रक्त के थक्कों का खतरा बढ़ रहा है। हालांकि, चिंता का कोई कारण नहीं है, डॉक्टर डी-डाइमर परीक्षण के माध्यम से मामले की निगरानी कर रहे हैं और प्रभावित व्यक्ति को सही दवा दे रहे हैं।
तीन समस्याएं जो बढ़ीं सेकेंड वेव में
-थ्रम्बोसिस इवेंट
-साइटोकिन स्टॉर्म
-सेकेंडरी इंफेक्शन
क्या है साइटोकिन स्टॉर्म-
देखा जा रहा है कि कई कोरोना वायरस के मरीज पहले खुद को बेहतर महसूस करते हैं। हालांकि बाद में उनका इम्‍यून सिस्‍टम कमजोर होने लगता है। इसके बाद उनका शरीर वायरस के मुताबिक ही रिएक्‍ट भी करता है। इसको साइटोकिन स्‍टार्म कहा जाता है। एक तय मात्रा खून में मौजूद साइटोकिन शरीर के इम्‍यून सिस्‍टम के लिए काफी कारगर होते हैं। हालांकि यदि खून में इनकी मात्रा अधिक हो जाए तो ये घातक साबित हो सकते हैं।
डीप वेन थ्रम्बोसिस
पैरों में दो तरह की नसें होती हैं। इनमें ऊपरी सतह वाली नसें व गहराई वाली नसें (डीप वेंस) मौजूद हैं। डीप वेंस दूषित रक्त को फेफड़ों और हार्ट तक पहुंचाती है, ताकि वहां से साफ रक्त अन्य हिस्सों तक जा सके। डीप वेन थ्रम्बोसिस यानी डीवीटी में पैरों की डीप वेंस में ब्लड क्लॉटिंग (खून के थक्के) हो जाती है, जिससे दूषित रक्त वापस हार्ट व फेफड़ों तक नहीं पहुंचता और पैरों में ही रुक जाता है। इस कारण पैरों में सूजन व दर्द होने लगता है।

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