बीएसएफ के लापता जवान की बेवा को मिली बीमे की रकम

अफसोस है कि उसे उठानी पड़ी वर्षों की जद्दोजहद : जस्टिस मुखर्जी
सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : बीएसएफ के एक जवान की बेवा को पति को मिलने वाली बीमे की रकम को पाने के लिए वर्षों की जद्दोजहद उठानी पड़ी। यह दुर्भाग्य और बेहद अफसोस की बात है। इस मामले में फैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट के जस्टिस अरिंदम मुखर्जी ने यह टिप्पणी की। बहरहाल उसे कामयाबी मिली है और एलआईसी ने उसके बैंक खाते में पांच लाख रुपए जमा कर दिया है। इसके साथ ही जस्टिस मुखर्जी ने बेवा की तरफ से दायर मामले का निपटारा कर दिया।
उसकी तरफ से पैरवी कर रहे एडवोकेट इब्राहिम शेख और एडवोकेट बेनजीर शेख ने कहा कि करीब ग्यारह वर्षों से गर्दिश के दौर से गुजर रही बेवा मैरून बीबी को राहत मिली है। इस मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि आठ वर्षों तक तो वह कानून की जंजीरों में जकड़ी रही और बाकी तीन साल हाई कोर्ट में मामला करते हुए गुजर गए। मुर्शिदाबाद के लालबाग के रहने वाले अली शेख की नियुक्ति बीएसएफ में बार्बर कंस्टेबल के पद पर हुई थी। उसे कॉमनवेल्थ गेम के समय 2010 में दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में तैनात किया गया था। इसी दौरान वह 17 सितंबर को लापता हो गया। एडवोकेट इब्राहिम शेख बताते हैं उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करायी गई थी और बहुत तलाश के बाद उसकी बरामदगी नहीं हो पाई। सरकारी कानून के मुताबिक अगर फोर्स का कोई जवान या अधिकारी लापता हो जाता है तो आठ साल तक उसकी वापसी का इंतजार करते हैं। अली शेख के लापता होने के बाद मैरून के लिए गर्दिश का दौर शुरू हो गया। कानून के मुताबिक उसे 2018 में एक अक्टूबर को मृत घोषित कर दिया गया। ग्रुप इंस्योरेंश स्कीम के तहत शेख अली का भी पांच लाख रुपए का बीमा कराया गया था। उसे मृत घोषित करने के बाद जब बीमे के रकम की भुगतान का सवाल आया तो एलआईसी ने इसे देने से इनकार कर दिया। एलआईसी की दलील थी कि 2010 के सितंबर के बाद से उसके प्रीमियम का कोई भुगतान नहीं किया गया इसलिए वह इसे पाने का हकदार नहीं है। मैरून ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में रिट दायर कर दी। जस्टिस अमृता सिन्हा और जस्टिस राजाशेखर मंथा के कोर्ट से गुजरते हुए यह मामला जस्टिस अरिंदम मुखर्जी के कोर्ट में आया। जस्टिस मुखर्जी का सीधा सवाल था कि भुगतान कौन करेगा-बीएसएफ या एलआईसी। इसके जवाब में अगली तारीख में एलआईसी के एडवोकेट ने बता दिया कि मैरून के बैंक खाते में पांच लाख रुपए जमा कर दिए गए हैं। जस्टिस मुखर्जी ने अपने फैसले में कहा है यह सिर्फ बदकिस्मती ही नहीं बल्कि पीड़ादायक भी है कि बीएसएफ के एक जवान की बेवा को अपने पति का दावा पाने के लिए, जिसकी वह हकदार है, वर्षों इंतजार करना पड़ा।

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