मिट्टी का आकर्षण हमेशा रहेगा बरकरार, इस दिवाली भी मिट्टी की मूर्तियों की मांग अच्छी

हर साल 1,000 जोड़ी मूर्तियां बनाते थे
सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : रोशनी का त्योहार दीपावली आने वाला है और इसके लिए लोग तैयारियों में भी जुट गये हैं। दिवाली पर पूरे घर को रोशन तो किया जाता ही है, इसके साथ ही लक्ष्मी – गणेश की मूर्ति की पूजा भी की जाती है। समय में बदलाव के साथ – साथ इन मूर्तियों में भी कई तरह के बदलाव आ गये। फाइबर से लेकर चिनी मिट्टी समेत अन्य कई तरह के मैटेरियल की मूर्तियां बाजारों में मिलने लगीं। हालांकि आज भी मिट्टी का आकर्षण उसी तरह बरकरार है। कहते हैं सनातनी हिन्दू धर्म में मिट्टी काे ही सबसे शुद्ध माना जाता है और ऐसे में मिट्टी की मूर्तियों की मांग इस बार भी दिवाली में काफी अच्छी है।
200 वर्षों से मिट्टी की मूर्तियां बनाता आ रहा है ये परिवार
नूतन बाजार में राजेंद्र कुमार प्रजापति का परिवार लगभग 200 वर्षों से मिट्टी की आदि मूर्तियां बनाता आ रहा है जिन्हें बौद्धकालीन मूर्तियां भी कहते हैं। उन्होंने कहा, ‘इस बार भी बाजार में मूर्तियों की मांग काफी अच्छी है। हमारा काम काफी हद तक स्थितियों पर भी निर्भर करता है और इस बार कोरोना काल के कारण हालात काफी अलग थे। वित्तीय स्थिति तो पहले से ठीक नहीं थी, इसके अलावा भारी बारिश के कारण भी उत्पादन पर काफी असर पड़ा। हर साल की तुलना में इस साल कुछ कम ही मूर्तियां बनायी गयीं, लेकिन बाजार में मांग काफी अच्छी है। हर साल जहां लक्ष्मी-गणेश की 1,000 जोड़ी मूर्तियां हम बनाते थे, वहीं इस साल 700-800 जोड़ी मूर्तियां ही बनायी गयीं।’
कोरोना काल में पड़ा काफी असर
राजेंद्र प्रजापति के अनुसार, ‘कोरोना काल में काफी असर पड़ा। बहुत से लोग बाहर नहीं निकलें और पुरानी मूर्तियों की पूजा भी की। वहीं कई लोगों ने केवल कैलेंडर से ही तस्वीर की पूजा कर ली। आज-कल की युवा पीढ़ी मिट्टी की मूर्तियों का महत्व उतना नहीं समझ रही जो ठीक नहीं है। हमारे धर्म में मिट्टी को ही सबसे शुद्ध माना जाता है, इस कारण दिवाली में पूरे घर को मिट्टी के दीयों से रोशन किया जाता है। हालांकि पिछली बार की तुलना में इस साल स्थिति काफी बेहतर है।’
इसलिए करते हैं नई मूर्ति की पूजा
हर साल मूर्ति बदलने को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। कई लोग इसे मंदिर में मूर्ति बदलने का एक अवसर मानते हैं तो कुछ लोग लक्ष्मी-गणेश की नयी मूर्ति की पूजा को धर्म से जोड़ते हैं, लेकिन शास्त्रों में कहीं भी नई मूर्ति की पूजा से जुड़ी बातें देखने को नहीं मिली हैं। मान्यता ये भी है कि पुराने समय में सिर्फ धातु और मिट्टी की मूर्तियों का ही चलन था। धातु की मूर्ति से ज्यादा मिट्टी की मूर्ति की पूजा होती थी। जो हर साल खंडित और बदरंग हो जाती है। वहीं ऐसा भी माना जाता है कि कुम्हारों की आर्थिक मदद को ध्यान में रखते हुए नई मूर्ति खरीदने की शुरुआत की गई। कई ऐसी मान्यताएं भी हैं कि नई मूर्ति एक आध्यात्मिक विचार का भी संचार करती है जो गीता में श्रीकृष्ण ने दिया है। नई मूर्ति लाने से घर में नई ऊर्जा का संचार होता है।

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