सत्ता का संग्राम : गुरु-शिष्य के बीच होगी सिंगुर में परिवर्तन की लड़ाई

इस बार भी क्या ठगा महसूस करेंगे यहां के लोग ?
चाहते हैं उद्योग मगर आसान नहीं दिख रही परिवर्तन की राह
उम्मीदवारों ने बढ़ायी मतदाताओं की कशमकश

सोनू ओझा

कोलकाता/सिंगुर : बंगाल में सिंगुर आंदोलन इतिहास का वह अध्याय है जिसने यहां की राजनीति में ममता बनर्जी को अलग ही जगह दी। इसके सहारे ही बंगाल की दीदी ने उस लाल दुर्ग को ध्वस्त किया जो 34 सालों से एकमुश्त खड़ा था। ​सिंगुर आंदोलन के कारण ही बड़े बहुमत के साथ सत्ता में ऐतिहासिक परिवर्तन हुआ। इस बार 2021 का चुनाव है और कई कारणों से एक बार फिर सिंगुर सुर्खियों में आ गया है। सिंगुर बंगाल की सत्ता परिवर्तन का प्रतीक रहा है और इस बार भी यहां परिवर्तन होगा कि नहीं यह सबसे बड़ा सवाल है। इसकी एक बड़ी वजह भाजपा का बंगाल में वर्चस्व का बढ़ना। दूसरी तरफ ममता बनर्जी जो पार्टी और अपने नेताओं की गतिविधियों के कारण उसी मुहाने पर आकर खड़ी हो गयी हैं जहां 2011 में माकपा खड़ी थी। इस सीट को लेकर इस बार विडम्बना यह है कि जो लोग अपने विधायक से परेशान या कहें त्रस्त थे उनके सामने आज वह दूसरी पार्टी से उम्मीदवार बनकर खड़े हैं। यानी उम्मीदवारों को लेकर कशमकश की स्थिति यहां के मतदाताओं की उलझनें बढ़ा रही हैं।
जनता ने कहा : मौका सब को दिया फिर भी ठगे गये हम
सिंगुर की जनता का मिजाज जानने के लिए वहां सन्मार्ग की टीम पहुंची तो ज्यादातर लोगों ने खुद को ठगा हुआ ही बताया। विकास साव का परिवार करीब 50 सालों से सिंगुर के बुरशांति इलाके में रहता आ रहा है। इनका कहना है कि किसान यहां खेती कर सकते हैं लेकिन पढ़े-लिखे युवाओं को नौकरी के लिए आज भी 40-50 किलोमीटर दूर कोलकाता जाना पड़ता है। आज अगर लखटकिया कार की फैक्टरी यहां लग गयी होती तो शायद तस्वीर अलग होती। इसी तरह स्वपन दास का मानना है कि माकपा के बाद तृणमूल को भी हमने मौका दिया मगर हमारे बारे में किसी ने नहीं सोचा, इसलिए फिर परिवर्तन के लिए सोचना पड़ रहा है। महादेव गोरा तृणमूल उम्मीदवार को तो पसंद कर रहे हैं मगर उद्योग की चाह उन्हें परिवर्तन लाने की ओर इशारा कर रही है। इसी तरह देव प्रसाद चक्रवर्ती कहते हैं कि यहां हमें सिर्फ उद्योग और विकास चाहिए फिर वह किसी के भी जरिये मिले।
सिंगुर का दंगल : गुरु-चेला की लड़ाई में सृजन लगा रहे है सेंध
सिंगुर आंदोलन में हमकदम बन एक साथ खड़े रहे ममता बनर्जी के दो खास सिपाही इस बार के विधानसभा चुनाव में एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोक रहे हैं। तृणमूल ने 4 बार के विधायक रवींद्रनाथ भट्टाचार्य यानी मास्टर मोशाय का टिकट काटकर बेचाराम मन्ना को चुनावी जंग में उतारा है, जबकि मास्टर मोशाय भाजपा के टिकट पर तृणमूल को चुनौती दे रहे हैं। ये तो बात हुई तृणमूल-भाजपा के उम्मीदवारों की, अब जिक्र करते हैं माकपा की जिसने इसी सिंगुर में नैनो का कारखाना लगाने की बात कही थी। माकपा ने सृजन भट्टाचार्य को यहां से अपना उम्मीदवार बनाया है।
लखटकिया कार की फैक्टरी ने सिंगुर को दी अलग पहचान
कोलकाता से करीब 50 किलोमीटर दूर हुगली के सिंगुर में करीब 997 एकड़ जमीन पर कभी हरियाली थी। वक्त ने ऐसी करवट बदली कि वहां उद्योग का एक सपना दिखाया गया जिस पर राजनीति इस कदर हावी हुई कि वहां बिछा कंक्रीट का जंगल तो उजड़ गया मगर जमीन न खेती करने लायक रही, न किसी और लायक बची, है तो बस ईंट-पत्थर और जंगलात। 18 मई 2006 में यहां लखटकिया कार की फैक्टरी बनाने की घोषणा की गयी थी जिसका ममता बनर्जी ने पुरजोर विरोध कर बड़ा किसान आंदोलन किया था। वाममोर्चा सरकार की सारी कोशिशें नाकाम रहीं जिसके बाद अक्टूबर 2008 में टाटा समूह ने नैनो फैक्टरी बंगाल से गुजरात ले जाने की घोषणा कर दी।
एक नजर 2016 के विधानसभा चुनाव पर
तृणमूल : रवींद्रनाथ भट्टाचार्य : 96,212 (50%)
माकपा : रबिन दे : 75,885 (39.50%)
भाजपा : सोरेन पात्रा : 14,264 (7.40%)

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