प्रतिवाद, सत्ता और अस्तित्व की लड़ाई का अखाड़ा बना सिंगुर

सिंगुर के महासंग्राम में ‘साइलेंट’ वोटर्स ने दिया त्रिमुखी लड़ाई को अंजाम
हर किसी को है अपनी जीत का भरोसा
सन्मार्ग संवाददाता
सिंगुर : बंगाल की सियासत का एक रास्ता सिंगुर भी माना जाता है। यहीं से ममता बनर्जी ने अपनी लड़ाई शुरु कर 34 सालों के वाम शासन का ध्वस्त किया था। सिंगुर में जीत की दो पारी खेल चुकी तृणमूल के लिए इस बार सिंगुर में जीत का राह इतनी आसान नहीं है क्योंकि यहां इनका टकराव अपने ही विधायक रवींद्रनाथ भट्टाचार्य से हो रही है। चुनावी मैदान में मास्टर मोसाय को टक्कर बेचाराम मन्ना दे रहे है। यह सभी जानते है कि दोनों के बीच छत्तीस का आंंकड़ा रहा है, स्थितियां इतनी बिगड़ी है कि मास्टर मोसाय ने पार्टी तक छोड़ दी और प्रतिवाद के लिए भाजपा का सहारा लिया। इस बीच संयुक्त मोर्चा भी है जो दोनों की लड़ाई में अपनी रोटी सेंकने की जुगत में लगा हुआ है।
प्रतिवाद, सत्ता और अस्तित्व का महासंग्राम है सिंगुर में
सिंगुर में इस बार अगर कहे कि मास्टर मोसाय के लिए प्रतिवाद, तृणमूल के लिए सत्ता, संयुक्त मोर्चा के लिए अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है तो कतई गलत न होगा। रवींद्रनाथ ने साफ कहा है कि उन्हें किसी से फर्क नहीं पड़ता सिर्फ बेचा को हराना है। इसी तरह बेचाराम भी अपनी जीत पक्की मानते हुए कह रहे है कि मास्टर मोसाय घर में रहने वाले नेता है और जनता को अपने साथ खड़ा रहने वाला प्रतिनिधि चाहिए। संयुक्त मोर्चा का युवा चेहरा सृजन भट्टाचार्य पार्टी का अस्तित्व बचाने की कमान संभाले है जिन्हें भरोसा है कि भाजपा और तृणमूल की लड़ाई का फायदा उन्हें मिलेगा।
साइलेंट वोटर्स देंगे लड़ाई को अंजाम
सिंगुर ऐसी सीट है जिसकी लड़ाई को अंतिम अंजाम यहां के साइलेंट वोटर्स दिये है। इन वोटरों में बड़ी संख्या घरेलू महिलाओं की है जिन्हें इस बात की समझ अच्छी तरह है कि उन्हें अपने मतदान का अधिकार किसके लिए करना है। सिंगुर के वोटरों को अपने हिस्से का विकास चाहिए और वह कौन देगा इसका आभास भी उन्हें है, इसी सोच को सामने रखकर सिंगुर की जनता ने तीनों उम्मीदवारों की किस्मत को ईवीएम में कैद कर दिया है।

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