… तो क्या अभी पूरी पिक्चर बाकी है ? मेगा शो के बाद चर्चा हुई और तेज

कोलकाता : कहा जाता है कि राजनीति में जो दिखता है वह होता नहीं और जो होता है वह दिखता नहीं। मसलन 1 और 1 दो नहीं बल्कि 11 माना जाता है। शायद आने वाले समय में बंगाल की राजनीति में ऐसा ही कुछ बड़ा हो सकता है। जैसा कि अनुमान था ही कि अपने मेगा शो से मंत्री शुभेंदु अधिकारी अहम कुछ कहेंगे और हुआ भी वैसा ही। शुभेंदु अधिकारी ने यह तो जरूर साफ किया कि वे अभी भी एक पार्टी के सक्रिय सदस्य और मंत्रिमंडल के सदस्य हैं, लेकिन उन्होंने एक बार फिर उस पार्टी यानी तृणमूल का नाम नहीं लिया।

शुभेंदु के मेगा शो के बाद असमंजस की हालत और बन गयी है। उन्होंने कहा कि वे नीति व आदर्श का विसर्जन कर काम नहीं करते हैं, उनके भाषण के कई मायने निकाले जा रहे हैं। राजनीतिज्ञ कह रहे हैं कि जो भी यह सब चल रहा है, यह धैर्य की परीक्षा है। धैर्य कौन दिखा रहा है, क्या यह धैर्य दोनों तरफ से (शुभेंदु और तृणमूल) है? धैर्य की चर्चा इसलिए हो रही है कि शुभेंदु अधिकारी ने अपने भाषण में साफ कहा कि मुख्यमंत्री ने उन्हें निकाला नहीं और उन्होंने भी मुख्यमंत्री को छोड़ा नहीं। शायद यही दोनों का धैर्य है? राजनीतिज्ञों का मानना है कि शायद शुभेंदु अधिकारी ‘सही मंच और सही समय’ का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में यह कयास है कि अभी पूरी पिक्चर बाकी है।

‘शहीद’ की उपाधि मिल जायेगी शुभेंदु को

भाषण में उन्होंने कहा कि शुभेंदु अधिकारी काल पात्र सब जानता है। अब चर्चा है कि अगर शुभेंदु अधिकारी खुद से जाते हैं या फिर पार्टी के अनुशासन के उल्लंघन के लिए पार्टी उनके खिलाफ कदम उठाती है तो उनके समर्थक यानी ‘आमरा दादार अनुगामी’ उन्हें शहीद का दर्जा देने काे तैयार बैठे हैं। दूसरी ओर आमरा दादार अनुगामी के पास्टरों के खिलाफ आखिर क्यों नहीं तृणमूल की तरफ से औपचारिक रूप से कदम उठाया जा रहा है? क्या यह भी धैर्य की परीक्षा का एक उदहारण है? यह भी सवाल उठ रहे हैं।

तो ऐसे बन और बिगड़ सकता है खेल

शुभेंदु अधिकारी की कथित तौर पर नाराजगी तृणमूल के लिए नुकसान और अन्य पार्टियों के लिए क्यों फायदेमंद हो सकता है, इसका एक कारण 2016 के उन जिलों के नतीजे हैं जहां शुभेंदु अधिकारी के अच्छे खासे समर्थक हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि इस बात का अंदाजा खुद तृणमूल को है। चर्चा है कि यही वजह है शुभेंदु की नाराजगी की खबर सुर्खियों में आयी तो पार्टी उन्हें मनाने में जुट गयी। वहीं इन पांच जिलों में 9 संसदीय सीटें हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में इन पांच जिलों में 5 सीटों पर तृणमूल की जीत हुई तथा 4 भाजपा के कब्जे में गयी।

राजनीतिक पार्टियों के लिए शुभेंदु के मायने

न सिर्फ उन्होंने कई जिलों में तृणमूल को सफलता दिलाने में अहम भूमिका निभाई बल्कि मुर्शिदाबाद और मालदह में भी कांग्रेस को कमजोर करने में उनका रोल अहम माना जाता रहा है।

 

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