ट्रांसजेंडरों के लिए अस्पतालों में अलग वार्ड : पीआईएल

पुरुषों को ये भाते नहीं और महिलाओं को जंचते नहीं
सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : पुरुष प्रधान समाज ट्रांसजेंडरों को हिकारत की निगाह से देखता है। महिलाएं उनके बीच अपने आप को बहुत सहज महसूस नहीं कर पाती हैं। इसलिए त्रेता युग से ही समाज में ही उनकी स्थिति त्रिशुंक जैसी बनी हुई है। अलबत्ता इन दिनों समाज की सोच में एक बदलाव आया है। इसी के मद्देनजर अस्पतालों में उनके लिए अलग वार्ड बनाने और अन्य सुविधाएं स्थापित करने की मांग करते हुए हाई कोर्ट में एक पीआईएल दायर की गई है।
एडवोकेट जोवेरिया सब्बाह ने यह पीआईएल दायर की है और उम्मीद है कि इसी सप्ताह हाई कोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस राजर्षि भारद्वाज की डिविजन बेंच इसकी सुनवायी करेगी। एडवोकेट सब्बाह बताती हैं कि यह पीआईएल कोविड-19 की दूसरी लहर और तीसरी संभावित लहर के संदर्भ में दायर की गई है। सवाल उठाया गया है कि उनके लिए अलग वार्ड और वाशरूम आदि जैसे बुनियादी ढांचे की व्यवस्था करना क्या राज्य सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। संविधान की धारा 21 के जीवन के अधिकार के साये में क्या उन्हें भी स्वास्थ्य सुविधाएं पाने का हक नहीं है। डिविजन बेंच से अपील की गई है कि वह राज्य सरकार को ट्रांसजेंडरों के लिए पर्याप्त चिकित्सा सुविधा, बेड, नर्स, पैरामेडिकल कर्मचारी और अलग वाश रूम की व्यवस्था करने का आदेश दे। इसमें हवाला दिया गया है कि कोलकाता में पहली बार एमआर बांगड़ अस्पताल में ट्रांसजेंडर कोविड मरीजों के लिए तीन बेड आरक्षित किए गए थे। वकीलों और एक्टिविस्टों की एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक रायगंज और बर्दवान के मेडिकल कालेज एवं हॉस्पिटल ‌और दिनाजपुर जिला अस्पताल में ट्रांसजेंडरों के लिए बेड आरक्षित किए गए थे। एडवोकेट सब्बाह कहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लिंग के आधार पर उन्हें थर्ड जेंडर के रूप में चिन्हित किया गया है और ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन एंड राइट्स) एक्ट 2019 के तहत उन्हें बहुत सारे अधिकार मिले हैं। एडवोकेट सब्बाह कहती हैं कि पर ट्रांसजेंडरों के साथ जो सुलूक होता है वह लोगों की संवेदनहीनता और 2019 के कानून के उल्लंघन का एक दस्तावेज है। यह पीआईएल कोविड तक ही सिमट गई है। पर यहां सवाल उठता है कि सितारों के बाद जहां और भी हैं के तर्ज पर कोविड-19 के अलावा भी तो और बीमारियां हैं। आम लोगों की तरह ये भी बीमार पड़ते हैं और अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। जब उन्हें थर्ड जेंडर के रूप में चिन्हित कर दिया गया है तो फिर उनके लिए पुरुष और महिला वार्ड की तरह थर्ड जेंडर वार्ड क्यों नहीं बनाए जाए जहां वे अपने आप को सहज महसूस कर सके। क्या 2019 के कानून के दायरे में यह सवाल मुनासिब नहीं है।

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