हिन्दीभाषियों तक दीदी के कार्यों को पहुंचायेगा तृणमूल का हिन्दी प्रकोष्ठ

कोलकाता : तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी की प्रेरणा व तृणमूल युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभिषेक बंद्योपाध्याय के प्रयास से तृणमूल कांग्रेस हिन्दी प्रकोष्ठ पूरी मजबूती के साथ मैदान में उतरा है। इस प्रकोष्ठ को दोबारा न सिर्फ सक्रिय किया गया बल्कि चुनावी​ माहौल में कैसे इसका उपयोग कर हिन्दीभाषियों को दीदी के कार्यों की जानकारी देनी है उसके लिए बेहतरीन प्लेटफॉर्म तैयार किया गया है।

तृणमूल का हिन्दी प्रकोष्ठ राज्यवासियों के बीच जाकर दीदी के कार्यों की जानकारी पहुंचाएगा। मंगलवार को प्रकोष्ठ के प्रेसिडेंट व राज्यसभा के पूर्व सांसद विवेक गुप्त ने हिन्दी सेल के 5 स्टेट कोऑर्डिनेटरों की घोषणा की तथा बताया कि कैसे यह प्रकोष्ठ पूरे राज्य में हिन्दीभाषियों की समस्या न सिर्फ सुनेगा बल्कि उसे दूर करने का प्लेटफार्म तैयार करेगा।

हिन्दी सेल के 5 जोनल कोऑर्डिनेटर

प्रेसिडेंसी रेंज : राजेश सिन्हा (तृणमूल कांग्रेस हिन्दी सेल के पूर्व कन्वेनर रह चुके है)

मालदह रेंज : श्याम लाल महतो (उत्तर दिनाजपुर के जिला युवा तृणमूल के कन्वेनर व एडवाइजर हैं)

मिदनापुर रेंज : रवि शंकर पाण्डे (25 सालों तक खड़गपुर नगरपालिका के चेयरमैन रह चुके हैं)

जलपाईगुड़ी रेंज : संजय शर्मा (दार्जिलिंग तृणमूल के महासचिव)

बर्दवान रेंज : जगदीश शर्मा (आसनसोल की खास शख्सियत हैं)

विवेक गुप्त ने बताया कि हिन्दी सेल को राज्यभर में गति प्रदान करने के लिए जल्द ही पार्टी की ओर से जिला प्रेसिडेंटों की घोषणा की जाएगी।

इस तरह काम करेगा तय

सेल के सदस्य जिला स्तर पर हर उस स्थान पर बैठक करेंगे जहां बड़ी संख्या में हिन्दीभाषी रहते हैं। वहां जाकर उनकी समस्या सुनी जाएगी। सरकारी स्तर पर उन्हें समस्त परिसेवाएं मिल रही हैं कि नहीं इसकी रिपोर्ट भी तैयार की जाएगी। उसके बाद उस रिपोर्ट के आधार पर जिस समस्या का समाधान तत्काल करना है वह किया जाएगा अन्यथा विचार-विमर्श के बाद लोगों को समस्यामुक्त करने का लक्ष्य है इस हिन्दी​ सेल का।

चुनावी दंगल में हिन्दीभाषी वोट जरूरी

बाकी राज्यों की ही तरह बंगाल में भी चुनाव में जीत या हार के लिए हिन्दीभाषी वोटर निर्णायक भूमिका में हैं। यहां की करीब 70-80 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां ये हिन्दीभाषी वोटर रहते हैं। भाजपा के पक्ष में हिन्दीभाषी वोट जाना बड़ी बात नहीं है इसलिए इन वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करना तृणमूल की बड़ी चुनावी रणनीति है। अगर इस रणनीति में तृणमूल पास होती है तो निश्चित तौर पर भाजपा को बड़ा झटका लगेगा क्योंकि भाजपा के लिए भी ये हिन्दीभाषी वोट बहुत मायने रखते हैं।

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