लोकल ट्रेनें बंद : रेलवे हॉकरों के सामने एक बार फिर जीने-मरने का सवाल

  • कब रेलवे स्टेशनों पर होगी चमक, दुकानदार हैं इंतजार में
  • सियालदह से 3 शाखाओं में ट्रेनों में हॉकरी करते हैं 37 हजार हॉकर
    हावड़ा/कोलकाता : राज्य में एक बार फिर कोरोना संक्रमण की भयावह ​स्थिति है और उसे रोकने के लिए राज्य सरकार की ओर से लोकल ट्रेनों को बंद कर दिया गया। इससे प्लेटफाॅर्म समेत बाहरी इलाकों की चमक एकदम फीकी पड़ गई है। इसका सबसे ज्यादा बुरा असर लोकल ट्रेनों में सामान बेचनेवाले हॉकरों पर पड़ा है। उनके सामने तो एक बार फिर से जीने व मरने का सवाल आकर खड़ा हुआ है कि वे अपना व अपने परिवार का पालन-पोषण कैसे करेंगे? कमोबेश हावड़ा व सियालदह डिविजन के लाइनों की तस्वीर एक जैसी ही है। लोकल तो बंद है, लेकिन दूरदराज की ट्रेनों के चालू होने के बावजूद वहां पर यात्रियों की कमी है। इसके कारण स्टेशन के आसपास इलाकों में मौजूद दुकानें तो ठीक तरीके से खुलती तो सही हैं लेकिन ग्राहक ही नदारद हैं। ऐसे में वहां के दुकानदार इंतजार में हैं कि आखिर कब उनके दिन सामान्य होंगे। उनके अनुसार पिछले करीब 1 साल से उनकी स्थिति एक जैसी हो गयी है। इधर स्टेशन परिसर के भीतर व ट्रेनों में घूमनेवाले हॉकरों की भी दशा एक जैसी है। उनका कहना है कि रेलवे ने ट्रेनों को चालू किया था और ट्रेनों में सामान बेचकर हॉकरों के लिए उम्मीद की किरण जगी थी लेकिन अब स्थिति फिर जस की तस हो गयी।
    क्या कहना है हॉकरों का
    हावड़ा स्टेशन के प्लेटफाॅर्म व ट्रेन में घूम-घूम कर चाय बेचनेवाले तरुण राय ने कहा कि वह पिछले 35 सालों से ऐसे ही दुकानदारी कर रहे हैं। पिछले लॉकडाउन ने उनकी स्थिति को खराब कर दिया था, लेकिन अब तो हालत बद से बदतर है। वह दुकान ही नहीं लगा पा रहे हैं। इधर लॉटरी टिकट बिक्री करनेवाले प्रदीप कुंडू को अभी ग्राहकों का ही इंतजार है। हावड़ा स्टेशन के संग्लग्न फल बिक्री करनेवाले सलकिया के बृजेश सोनकर ने कहा कि ऑफिस या​त्री उनके मुख्य ग्राहक हैं लेकिन लोकल ट्रेनों के बंद होने से उनके व्यवसाय पर बुरा असर पड़ रहा है। बस स्टैंड पर सुरेश साव की भात की दुकान है लेकिन कोरोना के कारण वहां कोई भात खाने के लिए नहीं आता है। सियालदह स्टेशन पर झालमूड़ी बिक्री करनेवाली बुला दास का कहना है कि उसकी आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब है। आंशिक लॉकडाउन में लोकल पैसेंजर नहीं होने से अब कोई झालमूड़ी नहीं खा रहा है।
    हॉकरों ने की लोकल ट्रेन चलाने की मांग
    बारासात-सियालदह, सियालदह मेन लाइन व हासनाबाद शाखा में रोजाना 40 लोकल ट्रेनें चलती हैं और इन ट्रेनों के जरिये ही अपनी रोजीरोटी की जुगाड़ करते हैं करीब 37 हजार हॉकर्स जो कि लॉकडाउन के बाद से बेरोजगार हैं। उनके सामने भूखों मरने की नौबत है। यही कारण है कि अब और वे किसी भी हाल में ट्रेन सेवाएं चालू करवाना चाहते हैं। ट्रेनों के नहीं चलने से आज उनके सामने भी गंभीर परिस्थितियां हैं तो दूसरी ओर ट्रेन यात्रियों को भी काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
    क्या कहना है रेलवे के अधिकारी का
    इस बारे में रेलवे के एक अ​धिकारी ने बताया कि कोरोना की भयावह स्थिति से लड़ने के लिए ही यह फैसला लिया गया है। वहीं देखा जाये तो पिछले साल 2020 में लॉकडाउन के खत्म होने के बाद रेलवे स्टेशनों पर सोशल डिस्टेंसिंग बनी रहे इसके लिए लिए हॉकरों को अनुमति नहीं दी गयी थी। वहीं सियालदह में सुंदरीकरण का काम किया गया है। इसलिए ऐसे भी हॉकरों को फिलहाल तो अनुमति नहीं दी गयी थी लेकिन स्थिति सामान्य होने के बाद हॉकर एक बार फिर लोकल ट्रेनों में चढ़कर सामान बेचने लगे थे।
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