जज भी तो इंसान होते हैं कोई कंप्यूटर नही : बेंच

नारदा मामले में लुथरा ने बिखेरी सीबीआई की दलील की धज्जियां
कोलकाता : जजों को अमोध नहीं माना जा सकता है। वे भी तो इंसान हैं, कंप्यूटर नहीं। उनके ईर्द-गिर्द परिस्थितियां ऐसी नहीं होनी चाहिए कि वे अपने शपथ (पदभार लेने से पहले लेते है) पर कायम नहीं रह सके। इसी का हवाला देते हुए ट्रांसफर की अपील की गई है। नारदा मामले की सुनवायी कर रही हाई कोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस राजेश बिंदल, जस्टिस आईपी मुखर्जी, जस्टिस हरीश टंडन, जस्टिस सौमेन सेन और जस्टिस अरिजीत बनर्जी के लार्जर बेंच ने सीबीआई के ट्रांसफर पिटिशन का हवाला देते हुए यह टिप्पणी की। एडवोकेट अमृता पांडे ने इस मामले की सुनवायी के बाबत जानकारी देते हुए बताया कि नारदा मामले को हाई कोर्ट में ट्रांसफर करने के लिए सीबीआई की तरफ से पिटिशन दायर किया गया है। इस मामले में मंत्री सुब्रत मुखर्जी व फिरहाद हकीम, पूर्व मंत्री मदन मित्रा व पूर्व मेयर शोभन चटर्जी अंतरिम जमानत पर हैं। बचाव बक्ष के एडवोकेट सिद्धार्थ लुथरा ने वृहस्पतिवार को सीबीआई के दलील की जम कर धज्जियां बिखेरी। एडवोकेट लुथरा ने कहा कि सीबीआई की तरफ से पैरवी कर रहे सालिसिटर जनरल का दावा है कि कोर्ट में चल रहे घेराव के कारण जज प्रभावित हुआ था। जज पूरी तरह प्रशिक्षित और अनुशासित होते हैं। इसका फैसला उनके मनमुवाफिक नहीं आया तो ट्रांसफर के लिए आवेदन कर दिया। हाई कोर्ट में मेल करने से पहले तो सीबीआई ने राज्यपाल को मेल किया था और उन्होंने भी इस बाबत कई एडवोकेटो से चर्चा की थी। एडवोकेट लुथरा ने कहा कि ट्रायल का ट्रांसफर एक सोची समझी रणनीति है। उन्हें पता है कि अंतुले मामले का सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनके पक्ष में नहीं जाएगा। उन्होंने कहा कि वीडिओ रिकार्डिंग से साफ है कि निजाम पैलेसे के आने जाने के रास्ते पर कोई बाधा नहीं थी। अलबत्ता सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने वीडिओ दिखाये जाने पर एतराज जताया। एडवोकेट लुथरा ने कहा कि सीबीआई का एफिडेविट झूठ का पिटारा है। एक में कहा गया है कि जमानत पर फैसला आने से पहले दाखिल किया तो दूसरे में कहते हैं कि एैसा नहीं कर पाए। भड़तंत्र, दबाव, धमकी और हिंसा ये सीबीआई के जुमले हैं। उन्होंने कहा कि सीबीआई का दावा है कि अभियुक्तों की गिरफ्तारी उनके घर से की गई, लेकिन एरेस्ट मेमो के मुताबित यह निजाम पैलेस में की गई। एडवोकेट लुथरा ने गिरफ्तारी की वैधानिकता पर सवाल उठाया। इसके जवाब में बेंच ने जानना चाहा कि क्या गिरफ्तारी की वैधानिकता पर बहस इस मामले की कार्यवाही के लिए प्रासंगिक है तो एडवोकेट लुथरा ने कहा कि वे यह साबित करना चाहते हैं कि जब गिरफ्तारी ही वैधानिक नहीं है तो फिर पुलिस हिरासत देने की अपील ही कैसे की जा सकती है। बहरहाल मामले की सुनवायी अधूरी रह गई और बेंच ने कहा कि अगली सुनवायी 15 जून को होगी।

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