दर्जी का काम कर देश के लिए सोना लाया हावड़ा के बेटे ने

मां की खुशी का ठिकाना नहीं, कठिन परिश्रम से जीता देश का दिल
हावड़ा : परिश्रम अर्थात मेहनत के ही द्वारा मनुष्य अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। कोई भी कार्य केवल हमारी इच्छा मात्र से ही नहीं सिद्ध होता है, उसके लिये हमें कठिन परिश्रम का सहारा लेना पड़ता है। वहीं परिश्रम के ही बल पर मनुष्य अपना भाग्य बना सकता है। ऐसा ही कुछ कर दिखाया हावड़ा के पांचला के रहनेवाले अचिंत्य शिउली ने। मात्र 11 साल की उम्र में पिता का साया सर से हटा और मां दर्जी का काम कर पेट पालती थी। मां के साथ खुद दर्जी का काम करनेवाले अचिंत्य ने आज देश का सर गर्व से ऊंचा कर​ दिया। गांव से लेकर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मंत्री व राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तक द्वारा बंधाइयों की झड़ी लग गयी है। मां की खुशी का मानो ठिकाना ही नहीं है। दरअसल 20 वर्षीय युवा वेटलिफ्टर अचिंत्य शिउली ने कॉमनवेल्थ गेम्स में पुरुषों की 73 किलोग्राम कैटगरी में भारत की झोली में एक और गोल्ड मेडल आया है। भारत का कॉमनवेल्थ गेम्स में यह तीसरा गोल्ड मेडल है। अचिंत्य ने स्नैच में 143 किलो वेट लिफ्ट कर कॉमनवेल्थ गेम्स का नया रिकॉर्ड बनाया है। इसके साथ ही उन्होंने क्लीन एंड जर्क में 170 किलो वेट लिफ्ट किया। कुल मिलाकर उन्होंने 313 किलो वजन उठाकर कॉमनवेल्थ गेम्स का रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज करवाया है। अचिंत्य ने कहा कि वह यहां जीतने नहीं बल्कि बेहतरीन परफॉर्म करने आये थे। उन्हें अभी देश के लिए और सोना जीतना है।
अचिंत्य के भाई आलोक ने बतायी संघर्ष की कहानी : अचिंत्य के बड़े भाई आलोक शिउली ने बताया कि उनके भाई के इस मुकाम तक पहुंचने में काफी संघर्ष करना पड़ा है। उनके पिता एक वैन चालक थे जिनकी मौत महज 38 साल की उम्र में हो गयी थी। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि उनके अंतिम संस्कार के लिए भी साधन जुटा पाना संभव नहीं हो पा रहा था। तब गांववालों के सहयोग से ही पिता का अंतिम संस्कार संपन्न हो सका था। उस समय अचिंत्य मात्र 11 वर्ष का था। उसके बाद अचिंत्य अपनी मां पूर्णिमा शिउली के साथ उनके काम में हाथ बंटाता था। पूर्णिमा एक दर्जी का काम करती है। अचिंत्य ने 2010 में वेट​लि​फ्टिंग शुरू की। वहीं आलोक घर चलाने के लिए खेतों में काम और लोडिंग-अनलोडिंग का काम करता था। बहुत संघर्ष करके भाई को पढ़ाया और वेटलिफ्टिंग का प्रशिक्षण दिलाया। दरअसल आलोक ने उसे उसके कोच अष्टम दास के पास पहुंचाया। उसके बाद उसने यह सफलता हासिल की।
सरकार करें सहयोग : अचिंत्य की मां पूर्णिमा ने कहा कि उनके बेटे ने कॉमनवेल्थ गेम्स में देश के लिए सोना जीता है। बेटे की इस उपलब्धि से वह बहुत खुश हैं, लेकिन उन्हें इस बात का अफसोस है कि राज्य सरकार को यह पता ही नहीं है कि इसी राज्य का एक लड़का यह सब करने में कामयाब हुआ है। उन्होंने कहा कि 2019 में राज्य सरकार की ओर से मामूली मदद मिली थी। इसके बाद फिर कभी सहयोग नहीं मिला। राज्य सरकार उनकी मदद करें। उनके बेटे के कोच अष्टम दास भी अचिंत्य की सफलता पर गर्व कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार की मदद से वह और आगे बढ़ सकता है।

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