आयी एक ऐसी होली, न रंगों की बरसात न गुलाल की बहार

हुगली : होली का दिन है और रिसड़ा की सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ है। सदियों बाद एक ऐसी होली आई है जिसमें न रंगों की बरसात है और न ही गुलाल की बहार। एक दूसरे को रंग लगाने की होड़ में गलियों में भागदौड़ करते बच्चों की टोली भी इस बार लापता है।अलबत्ता यह सन्नाटा कुछ देर के लिए टूटता है। श्रीरामपुर विधानसभा केंद्र से भाजपा के उम्मीदवार कबीर शंकर बोस के समर्थन में उनके सैकड़ों समर्थक कबीर दा को वोट दो का नारा लगाते हुए गुजरते हैं। इसके बाद सन्नाटा फिर लौट आता है और गाहे-बगाहे टोटो रिक्शा आदि के शोर से कुछ देर के लिए टूट जाता है। भाजपा के इस जुलूस के बाद बाकी दलों के समर्थक भला पीछे कैसे रह जाएंगे। लोग कहते हैं कि तृणमूल के उम्मीदवार सुदीप्त राय और संयुक्त मोर्चा के उम्मीदवार अशोक रंजन बनर्जी के समर्थक भी जरूर आएंगे हो सकता है शाम ढलने तक आए।दूसरी तरफ बाजार की दुकानें बंद है लेकिन रंगों और गुलाल की छोटी मोटी कुछ दुकानें सड़कों पर लगी है। रंग भी हैं और गुलाल भी है पर खरीदारों का टोटा है। दुकानदार कहते हैं कि उन्हें भी पता था कि इस बार की होली बेरंग होगी। कहते हैं कि इसीलिए रंग हो या गुलाल ज्यादा माल नहीं उठाया था। फिर भी दुकानदारी तो करनी है लिहाजा दुकानें लगा ली है और बारह बजे तक उठा लेंगे। सबसे दिलचस्प नजारा तो चाय की दुकानों का है, बस चार पांच ही अड्डा पर जमे है। छुट्टी का दिन हो और चाय की दुकानें खाली हो बंगाल में ऐसा नहीं होता है। अड्डा जम कर लगता है और पालक साग से लेकर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों तक पर चर्चा होती है। इस बार तो वोट दरवाजे पर दस्तक दे रहा है और चाय की दुकानों में सन्नाटा हो ऐसा तो बंगाल का दस्तूर नहीं है। ऐसे में तो विश्लेषक चुनाव परिणाम से लेकर सरकार बनने और उसके चलने तक के बारे में जोरदार बहस के बीच अपनी राय रख देते हैं। पर क्या कीजिएगा कोरोना का इसने तो समाज की हर गतिविधियों पर एक ताला जड़ दिया है सो इस साल की होली भी बेरंग होकर रह गई है।

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