ममता के साथ खड़े रहे बंगाल के हिन्दीभाषी

70 से 80 विधानसभा सीटों पर हिन्दीभाषी मतदाताओं पर थी सभी पार्टियों की नजर
हिन्दी प्रकोष्ठ व हिन्दी अकादमी की रही अहम भूमिका
सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : बंगाल में 1 करोड़ से अधिक की संख्या में रह रहे हिन्दी भाषी समाज ने विपक्षी पार्टियों के लुभावने वादों को सिरे से नकार दिया। वे चट्टान की तरह अडिग रहे। ममता बनर्जी का साथ दिया। इसमें बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभायी तृणमूल के हिन्दी प्रकोष्ठ ने। कई तरह के नारे दिये गये, अफवाह फैलायी गयी। बाहरी-भीतरी का मुद्दा उछाला गया लेकिन हिन्दी​ भाषियों ने ममता बनर्जी पर ही भरोसा जताया।
इस बार के चुनाव के लिए यह कहा गया था कि हिन्दी भाषी समाज जिस पक्ष को अपना समर्थन देगा, जीत उनकी ही होगी और आखिरकार ऐसा ही हुआ। हिन्दी भाषियों ने तृणमूल को जीत की हैट्रिक दिला दी। बंगाल में कई ऐसे इलाके हैं, जहां मिनी बिहार, मिनी यूपी तो कहीं मिनी राजस्थान बसता है। बंगाल के हर जिले में कहीं कम तो कहीं अधिक की संख्या में हिंदी भाषा-भाषी रहते हैं और ये चुनाव में अहम भूमिका निभाते हैं। बंगाल इन सभी की कर्मभूमि बन चुकी है। चुनावी रणनीति में कई समीकरण काफी महत्व रखते हैं। यहां पर कुल विधानसभा सीटों में 70-80 सीटें ऐसी थीं जहां हिंदी भाषी निर्णायक भूमिका में थे। कई विधानसभा क्षेत्रों में हिंदी भाषियों की बड़ी जनसंख्या के मद्देनजर राजनीतिक दल इन वोटरों को लुभाने के लिए जी-जान से जुटे हुए थे। पिछले लोकसभा चुनावों में हिंदू-हिंदी वोटरों के भरोसे ही भाजपा ने 42 में से 18 सीटें ले ली थीं और इस बार भी वे इन्हीं के भरोसे थे लेकिन इस चुनाव में हिन्दीभाषियों ने एकजुट होकर सारा प्यार ममता दीदी पर ही लुटा दिया। यहां की राजनीति में बंगाल में रच बस गये हिन्दीभाषी मतदाताओं की हमेशा से अहम भूमिका रही है। कांग्रेस, फिर वाम मोर्चा और इसके बाद तृणमूल। तीनों पार्टियों के शासनकाल में हिन्दीभाषियों ने अपनी पूरी 100 फीसदी मेहनत की।
और यह फैसला सुना दिया हिन्दीभा​षियों ने
इस विधानसभा चुनाव में हिंदीभाषी मतदाताओं को अपनी पार्टी की ओर आकर्षित करने के लिए भाजपा ने जैसे अपना प्रेम बढ़ाया, तृणमूल भी पीछे नहीं रही। मुख्यमंत्री ने मां,माटी और मानुष के नाम से संदेश बांग्ला के साथ ही साथ हिंदी में भी बनवाया और उसे हिन्दी बोलने वालों के बीच बंटवाया गया।
पिछले साल 14 सितंबर को उन्होंने पश्चिम बंगाल हिंदी अकादमी का पुनर्गठन किया और राज्यसभा के पूर्व सांसद विवेक गुप्त को सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। बंगाल में 34 सालों तक वाममोर्चा का परचम रहा मगर हिन्दी को वह दर्जा नहीं मिला जो मिलना चाहिए। 2011 में पहली बार सत्ता में आयी तृणमूल सरकार ने हिंदी को वह मान दिया जिसकी हकदार बंगाल में हिंदी रही है। बंगाल में हिंदीभाषियों की दिशा और दशा सुधारने के लिए तृणमूल सरकार तभी से काम करती आयी है मगर अब इसका दायरा और बढ़ाने के लिए पार्टी स्तर पर हिंदी प्रकोष्ठ का गठन किया गया। यह एक माध्यम बना हिन्दी भाषियों तक सीधे तौर पर पहुचने का। इसकी भी जिम्मेदारी विवेक गुप्त को दी गयी।
कोलकाता सहित हावड़ा, हुगली, उत्तर 24 परगना, शिल्पांचल व नार्थ बंगाल की जनता ने दिया दीदी का साथ
हिन्दी भाषी क्षेत्रों में आसनसोल, रानीगंज, पुरुलिया, बांकुड़ा, बैरकपुर, उत्तर कोलकाता व दक्षिण कोलकाता, हावड़ा, दमदम, कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, अलीपुरदुआर, दुर्गापुर, जादवपुर व दार्जिलिंग आदि प्रमुख क्षेत्र हैं। इसके अलावा नार्थ बंगाल में भी भारी संख्या में हिन्दी भाषी लोग रहते हैं। हुगली नदी के दोनों किनारे जूट मिल इलाकों में बड़ी संख्या हिंदी भाषियों की आबादी है। पूरे चुनावी अभियान में बंगाल की बेटी और बाहरी का मुद्दा तृणमूल ने जोर-शोर से उठाया और यह दांव उसकी जीत में काफी काम आया। मोदी व शाह पर निशाना साधते हुए ममता ने लगातार अपनी चुनावी रैलियों में कहती दिखीं कि वह गुजरात के लोगों को बंगाल पर शासन नहीं करने देंगी। साथ ही दूसरे राज्यों से यहां भाजपा के प्रचार के लिए आए नेताओं को वह लगातार बाहरी गुंडा कहकर संबोधित करती रहीं। हिन्दी भाषियों को दीदी ओ दीदी, दो मई-दीदी गईं, दीदी की स्कूटी नंदीग्राम में गिर गई जैसे बयान रास नहीं आये और भाजपा को उन्होंने नकार दिया। लगातार केन्द्रीय एजेंसियों के हमले ने सहानुभूति का काम किया। इसी का परिणाम है कि लगातार तीसरी बार ममता बनर्जी ने बंगाल की सत्ता पर काबिज होने की कामयाबी हासिल की है।

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