राजनीतिक सीमाओं से ऊपर होता है राज्यपाल : गोपाल कृष्ण गांधी

‘राज्यपाल महज एक पद नहीं बल्कि राज्य के हर पहलुओं को संभालने की क्षमता रखने वाला शख्स होता है, यहां राजनीति की जगह नहीं होती बल्कि सत्ता, प्रशासन और जनता सभी की जिम्मेदारी होती है’
कोलकाता : बंगाल की सियासत में 2004-2009 तक राज्यपाल के रूप में बेहतरीन नाम दर्ज करा चुके राज्य के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी इस पद की गरिमा को राजनीतिक सीमाओं से ऊपर मानते हैं। सन्मार्ग के साथ हुए विशेष साक्षात्कार में गोपाल कृष्ण गांधी ने अपने इन्हीं अनुभवों को साझा किया जिन के प्रमुख अंश कुछ इस तरह हैं –
प्रश्न : लोकतंत्र में राज्यपाल की भूमिका क्या है?
* राज्यपाल महज एक पद नहीं है, बल्कि वह जिम्मेदारी है जिसमें एक राज्य में सत्ता, प्रशासन और जनता हर किसी को साथ लेकर चलना होता है। लोगों की बातें सुननी होती हैं। समस्याओं का समाधान करना होता है। इस पद पर आसीन होने वाले के लिए राजनीतिक सीमा पूरी तरह समाप्त हो जाती है। हमारे देश में कई उदाहरण भी हैं इसके। मुझे महसूस होता है राज्यपाल इमरजेंसी लाइट की तरह होता है, जो जरूरत पड़ने पर अपनी क्षमता का प्रमाण देता है। किसी राज्य में अगर राष्ट्रपति शासन की स्थिति पैदा होती है तो, उस वक्त भी राज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। स्थितियों के आधार पर देखें तो कर्नाटक के राज्यपाल टीएन चतुर्वेदी एनडीए द्वारा नियुक्त राज्यपाल थे, लेकिन उनके काम में कहीं भी पक्षपात नहीं दिखा। इसी तरह राम कापसे थे, जिन्होंने अपने कार्यकाल में जो भी कदम उठाया उसमें तनिक भी राजनीति नहीं झलकी।
प्रश्न : 2004-2009 बंगाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण काल था, ऐसे वक्त में आपके हाथों में बंगाल की कमान राज्यपाल के रूप में थी। कैसे रहे आपके अनुभव?
* बेहद महत्वपूर्ण कुछ था तो वह सिंगुर की समस्या थी, जिसका समाधान तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और विरोधी दल की नेत्री ममता बनर्जी की दक्षता के साथ किया गया था। इसके अलावा मुझे नहीं लगता कि किसी तरह की जटिल समस्या के बीच मैं फँसा था। हालांकि बंगाल में राजनीतिक समस्याएं हमेशा से ही रही हैं।
प्रश्न : पूर्व राज्यपाल होने के नाते आज के संदर्भ में क्या आपको लगता है, यह पद अप्रासंगिक हो चुका है?
* अपने विचारों की बात करूँ तो मुझे लगता है पहले की तुलना में आज राज्यपाल का पद बेहद प्रासंगिक बन चुका है। आज राजनीतिक प्रतियोगिताएं काफी बढ़ गई हैं, ऐसी स्थिति में राज्यपाल को संविधान का मान रखते हुए अपने दायित्व को बखूबी निभाना होता है, जो बेहद महत्वपूर्ण है।
प्रश्न : देश जल्द ही 75वें आजादी का जश्न और नेताजी की 125 वीं जयंती मनाने जा रहा है, आप बापू के पोते हैं, ऐसे में देश की मौजूदा स्थिति पर आपके विचार क्या हैं?
* देश जब आजाद हुआ था तभी निश्चित हो चुका था कि यहां एक धर्म, भाषा या जाति के लोग नहीं हैं, बल्कि कई धर्मों, भाषाओं और जाति का मिलाजुला हमारा भारत है। इन बातों को दोबारा विचार करने की आवश्यकता है। देश के इन्हीं आधारों को देखते हुए गांधी जी ने अपने प्राण त्याग दिए। इसी तरह नेताजी थे, उनका मकसद ही था कि आजाद हिंद फौज या कहें उनके राजनीतिक परिदृश्य के मार्फत इस देश को एक सूत्र में बांधा जा सके। आजादी के 75 साल में इन बातों का ध्यान रखना अति आवश्यक है।
प्रश्न : राष्ट्रवाद पर आपके विचार क्या हैं ?
* कवि गुरु रवींद्र नाथ टैगोर से ज्यादा भारत को प्यार करने वाला दूसरा नहीं हुआ है। देश प्रेम बोलें या राष्ट्रवाद की कोई तुलना नहीं होती, बल्कि मां के साथ जैसा प्यार होता है, वैसा ही देश के साथ लगाव होता है। मैं से हम की भावना ही राष्ट्रभक्ति है, जिसके लिए मातंगिनी हाजरा, भगत सिंह, महात्मा गांधी ने अपने प्राणों की आहुति दी। रवींद्र नाथ टैगोर ने अपनी भाषा में इसी राष्ट्रवाद को दिखाया है, इसकी चंद लाइनें इस प्रकार है – रात्रि प्रभातिला उदिला रोबी-छोबी पूर्वा उदयागिरी वाले….यानी जैसे ही यह रात खत्म होती है, भारत के पूर्वी पहाड़ पर एक नयी सुबह की चमक का सामना होता है।

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