दांव पर लग गया पांच दशक का राजनीतिक करियर

सोनू ओझा
पार्थ चटर्जी के फर्श से अर्श तक का सफर
छात्र नेता बने, कॉरपोरेट जॉब की, सक्रिय राजनीति में रहे
कोलकाता : 60 के दशक की बात है, छात्र नेता के रूप में एक युवा शख्स राजनीति की ओर कदम बढ़ाता है। कुछ दिन तक जोश रहता है फिर रुख बदलकर कैरियर की तरफ ध्यान लगाता है, मगर दिलचस्पी राजनीति से कम नहीं होती और आखिरकार सक्रिय राजनीति में दांव लगाना शुरू कर देता है। यह युवा चेहरा कोई और नहीं बल्कि आज की तारीख में पश्चिम बंगाल सरकार के वरिष्ठ मंत्री पार्थ चटर्जी हैं। इन दिनों पार्थ ईडी की हिरासत में है, उन पर शिक्षक भर्ती घोटाले में लिप्त होने का आरोप है। 2 दिन पहले ही ईडी ने करीब 26 घंटे की लंबी पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार किया है। इतना ही नहीं उनकी करीबी अर्पिता मुखर्जी के घर से ईडी को 21 करोड़ से अधिक कैश बरामद हुआ है। पार्थ चटर्जी तृणमूल कांग्रेस का जाना माना चेहरा है जो पार्टी के या कहें चेयरपर्सन ममता बनर्जी के खास खास माने जाते रहे हैं। पार्थ चटर्जी के फर्श से अर्श और फिर इसी जमीन पर उतरने तक की कहानी काफी दिलचस्प रही है।
पूरे राजनीतिक कैरियर में पार्थ चटर्जी का नाम लगभग साफ सुथरा ही रहा लेकिन इन आखिरी दिनों में एक स्कैम की परतों ने उनके पूरे राजनीतिक करियर को दांव पर लगा दिया।
60 के दशक में कांग्रेस छात्र नेता के तौर पर ली थी एंट्री
कहा जाता है कि पार्थ की दिलचस्पी हमेशा से ही राजनीति में रही थी। इसी वजह से 60 के दशक में जब वह कॉलेज में थे तब उन्होंने कांग्रेस छात्र नेता के रूप में राजनीति में एंट्री ली। यहां पढ़ाई के साथ वह छात्र राजनीति में भी लगातार सक्रिय रहे। पढ़ाई के बाद कॉरपोरेट जॉब में दिखाई दिलचस्पी राजनीति से दूर ना रह पाए पार्थ चटर्जी ने पढ़ाई के साथ जब कैरियर की बात आई तो राजनीति की जगह कॉरपोरेट जॉब को चुना। काफी मन लगाकर वह काम करते रहे मगर भीतर से एक कमी उन्हें हमेशा खलती रही।
1998 से शुरू की सक्रिय राजनीति
कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने जब तृणमूल कांग्रेस का गठन किया तब पार्थ चटर्जी 1998 में सक्रिय राजनीति में ममता के साथ उतरे। इस दौरान उन्होंने हर जगह ममता बनर्जी का राजनीतिक स्तर पर साथ दिया। कहा जा सकता है कि ममता के तब से अब तक के साथ देने वाले नेताओं में चटर्जी का नाम शीर्ष में आता है। यहीं से ममता का विश्वास भी उन पर अटल हुआ और उन्होंने 2007 में पार्थ को तृणमूल कांग्रेस का महासचिव नियुक्त किया। इस बीच विधानसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर भी पार्थ ने ही जिम्मा संभाला था
पांच बार विधायक तीसरी बार मंत्री बने
पार्थ चटर्जी तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर 2001 में पहली बार विधायक चुने गए थे। तब से अब तक वे लगातार पांचवीं बार विधायक बने हैं। इस बीच 2011 में राज्य में हुए सत्ता परिवर्तन में उन्हें कैबिनेट में जगह मिली और अब तीसरी बार जब पार्टी सत्ता में है तब तक उन्होंने कैबिनेट में अपनी जगह बनाए रखें। चटर्जी को संसदीय मामलों के मंत्री, शिक्षा विभाग और उद्योग विभाग का भार संभाला है।
2007 में पॉलिटिकल ग्राफ चढ़ा
बंगाल की राजनीति में 2007 वह वक्त था जब राज्य में सिंगूर और नंदीग्राम का आंदोलन छिड़ा था। तब पार्थ विधानसभा में विपक्ष की तरफ से एक बुलंद आवाज के रूप में उभरे थे। 2011 में कैबिनेट में उन्हें उद्योग विभाग और संसदीय मामलों का मंत्री बनाया गया। 2014 में फेरबदल करते हुए उन्हें उद्योग की जगह शिक्षा मंत्री बनाया गया। 2019 में शिक्षक नियुक्ति घोटाले को लेकर जब बात सामने आई तो धीरे-धीरे इतनी आगे बढ़ी कि पार्थ चटर्जी इसमें फंसते चले गए। एक समय में जिस पार्थ चटर्जी पर पार्टी के नाराज नेताओं को मनाने का जिम्मा दिया गया था उन्हीं को लेकर अब कह सकते हैं कि पार्टी भी एक्शन के मूड में है,क्योंकि कह दिया गया है कि अगर इस घोटाले में उनकी लिप्तता मिलती है तो सरकार उनके खिलाफ पार्टी एक्शन लेगी।

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