उत्तर बंगाल के जातीय संगठनों ने भाजपा सांसद के बयान से खुद को किया अलग

कोलकाता : पिछले कई दशकों में उत्तर बंगाल को पृथक राज्य बनाने को लेकर आंदोलन का नेतृत्व करने वाले कई जातीय समूह ने क्षेत्र के सभी जिलों को मिलाकर केंद्र शासित प्रदेश बनाने की भाजपा सासंद की विवादित मांग से खुद काे अलग कर लिया है। अलीपुरद्वार से भाजपा सांसद जॉन बार्ला ने बंगाल को विभाजित करने की मांग कर राज्य में सियासी बहस छेड़ दी है। हालांकि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और अन्य पार्टियों ने कड़ा ऐतराज जताया है। बार्ला की मांग की क्षेत्र के प्रमुख पहचान आधारित समूहों -गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (जीजेएम), ग्रेटर कूच बिहार पीपल्स एसोसिएशन (जीसीपीए) और कामतापुर आंदोलन समर्थकों ने हिमायत नहीं की है। उन्होंने कहा कि यह 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले बेचैनी पैदा करने की एक कोशिश है। बार्ला ने उत्तर बंगाल के पार्टी नेताओं के साथ बातचीत करते हुए कहा था कि वह इस मामले को संसद के आगामी मानसून सत्र में उठाएंगे। हालांकि उनके नजरिए का जलपाईगुड़ी से भाजपा सांसद जयंत रॉय और अन्य नेताओं ने समर्थन किया है। हालांकि प्रदेश भाजपा ने उनकी इस मांग से दूरी बना ली है कि और कहा कि यह बार्ला की निजी राय है। पहले इस क्षेत्र में एक स्वायत्त आदिवासी क्षेत्र के लिए आंदोलन का नेतृत्व करने वाले बार्ला ने कहा कि उत्तर बंगाल की लंबे समय से उपेक्षा की गयी है और टीएमसी के नेतृत्व वाले राज्य से इसे अलग करके ही क्षेत्र में विकास की शुरुआत करने का एकमात्र तरीका हो सकता है। अपने रुख पर डटे रहे भाजपा सांसद ने कहा, ‘अतीत में यहां अलग कामतापुरी, ग्रेटर कूचबिहार और गोरखालैंड के लिए आंदोलन होते रहे हैं। इसने मुझे यह मांग उठाने के लिए प्रेरित किया और सच कहूं, तो उत्तर बंगाल क्षेत्र लंबे समय से उपेक्षित रहा है। इसे अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाना चाहिए।’ तराई-डुआर्स के आदिवासी नेता ने यह भी कहा कि वह और क्षेत्र के अन्य नेता इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात करेंगे।
उत्तर बंगाल क्षेत्र 1980 की दशक के शुरुआत से पृथक राज्य की मांग को लेकर कई हिंसक आंदोलन का गवाह रहा है। यह आंदोलन गोरखा, राजबंशी, कूच और कामतापुरी समुदायों जैसे जातीय समूहों ने चलाए थे। जीजेएम के महासचिव रोशन गिरी ने बार्ला की मांग को खारिज करते हुए कहा, ‘उत्तर बंगाल के सभी जिलों को मिलाकर एक केंद्र शासित प्रदेश या एक अलग राज्य किस उद्देश्य की पूर्ति करेगा? हम अलग गोरखालैंड राज्य चाहते थे। हम 1980 के दशक से इसके लिए लड़ रहे हैं। हमें भाजपा पर भरोसा नहीं है। उन्होंने 2009 से हमें बेवकूफ बनाया है।’ गोरखालैंड की मांग पहली बार 1980 के दशक में की गई थी और सुभाष घीसिंग के नेतृत्व वाले जीएनएलएफ ने 1986 में एक हिंसक आंदोलन शुरू किया, जो 43 दिनों तक चला, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। जीजेएम के गुरुंग गुट से जुड़े गिरी ने दावा किया कि भाजपा ‘झूठे वादे’ कर रही है और उनके संगठन को अब बनर्जी पर पूरा भरोसा है क्योंकि उन्होंने स्थायी राजनीतिक समाधान का वादा किया है। उनके संगठन ने विधानसभा चुनाव से पहले टीएमसी से हाथ मिलाया है। उनकी हां में हां मिलते हुए जीसीपीए के बंशी बदन बर्मन ने कहा कि अलग केंद्र शासित प्रदेश राजबंशी के लिए एक स्वतंत्र राज्य की मांग के समान नहीं हैं, जिनकी राज्य की अनुसूचित जाति में सबसे ज्यादा आबादी हैं। उन्होंने कहा, ‘स्वतंत्रता के बाद कूचबिहार रियासत का भारत में विलय हुआ और इसे सी-श्रेणी का राज्य बनाने का वादा किया गया था। लेकिन वह वादा पूरा नहीं हुआ और कूचबिहार रियासत का कुछ हिस्सा असम और पश्चिम बंगाल के बीच बंट गया। इसलिए उत्तर बंगाल को एक राज्य या केंद्र शासित प्रदेश बनाने से बहुत मदद नहीं मिलेगी।’ कामतापुर प्रोग्रेसिव पार्टी के वाइस प्रेसिडेंट राजेन रॉय ने कहा कि जब तक भाजपा सांसद अपनी मांग को संसद में नहीं उठाते, तब तक इसे राजनीतिक चमक के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता। अगर इस मुद्दे को वह संसद में उठायेंगे तो इस पर कुछ सोचा जा सकता है। फिलहाल कामतापुरी के लिए राज्य सरकार ने कई विकास कार्य किये हैं, ऐसे में हम राज्य सरकार के साथ हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस सांसद प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा कि ऐसा प्रस्ताव केवल जनता को विभाजित करेगा और कभी वास्तविक नहीं बनेगा, क्योंकि इसे पहले विधानसभा से पारित कराने की जरूरत है।

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