दीदी के लंबे समय के 3 पुराने साथियों ने छोड़ा साथ

टिकट मिलने के बाद भी महिला विधायक ने छोड़ी पार्टी
राजनीति दो दिन का खेल नहीं, दलबदल इलाज नहीं – राजनीतिज्ञ
मुद्दा था केवल टिकट ?
सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : कहा जाता है कि राजनीति में 1 और 1 दो नहीं बल्कि 11 होता है। यहां कब कैसे राजनीतिक समीकरण बदल जाये यह कहना मुश्किल है। इस बार बंगाल के विधानसभा चुनाव कई मायने में ऐतिहासिक होने जा रहे हैं जहां लंबे समय के रिश्ते भी तार-तार हो गये और जब टिकट नहीं मिला तो साथ छोड़ दिया। दरअसल टिकट नहीं मिलने के बाद सोनाली गुहा, जटू लाहिड़ी और रवींद्रनाथ भट्टाचार्य जैसे वरिष्ठ नेता तृणमूल छोड़कर भाजपा में चले गये। यहां उल्लेखनीय है कि सोनाली गुहा, रवींद्रनाथ और जटू लाहिड़ी दीदी के बेहद ही पुराने साथियों में शामिल रहे हैं। हालांकि शामिल होने वालों का कहना है कि उन्हें टिकट नहीं बल्कि काम करना है।
उम्र 80 के पार, लेकिन चुनाव लड़ने का जज्बा बरकरार
सिंगुर के विधायक रवींद्रनाथ भट्टाचार्य की बढ़ती उम्र (80 के पार) को देखते हुए तृणमूल ने इस बार टिकट नहीं दिया मगर रवींद्रनाथ को ऐसा नहीं लगता है। उनके राजनीतिक कैरियर में उम्र बाधा नहीं डाल सकती है। इसी तरह शिवपुर के विधायक जटू लाहिड़ी जिनकी उम्र करीब 84 है, उन्हें भी बढ़ती उम्र के कारण टिकट नहीं दिया गया।
चार बार के विधायक रहे हैं रवींद्रनाथ और पहली महिला डिप्टी स्पीकर रही हैं सोनाली
दलबदल में शामिल मास्टरजी तथा सिंगुर से चार बार के विधायक रवींद्रनाथ भट्टाचार्य दीदी के पुराने साथी रहे हैं। मास्टरजी 2001 से लेकर 2016 तक चार बार विधायक रहे। सिंगुर आंदोलन में दीदी के कई साथियों में से एक चेहरा रवींद्रनाथ भट्टाचार्य का भी रहा। सोनाली गुहा दक्षिण 24 परगना जिले की सतगछिया विधानसभा सीट से तृणमूल की मौजूदा विधायक हैं। वह चार बार विधायक चुनी जा चुकी हैं। वहीं पश्चिम बंगाल विधानसभा में पहली महिला डिप्टी स्पीकर भी रही हैं।
सोनाली गुहा एक समय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की करीबी सहयोगियों में से एक थीं। टिकट नहीं मिलने के बाद मीडिया के सामने फूंट- फूंटकर वह रोने लगीं। सोनाली गुहा ने मीडिया से बात करते कहा कि भगवान, दीदी को सदबुद्धि दें। मैंने ममता बनर्जी का साथ शुरू से दिया है। पता नहीं दीदी ने ऐसा फैसला क्यों किया है।
टिकट मिलने के बाद भी सरला ने छोड़ी पार्टी
मालदह के हबीबपुर की तृणमूल विधायक रही सरला मुर्मू को पार्टी ने टिकट दिया था मगर उसके बाद भी उन्होंने तृणमूल छोड़ दिया। ऐसी चर्चा तेज है कि सरला को उनकी पसंदीदा सीट से कथित रूप से उम्मीदवार नहीं बनाए जाने के बाद उन्होंने तृणमूल काे छोड़ा है। वहीं सरला का कहना है कि पार्टी पद तो देती है मगर काम करने का पूरा मौका नहीं मिलता है।

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