भाजपा में मंथन शुरू, आखिर क्यों इस तरह के आये नतीजे ?

निष्कर्ष : वाम – कांग्रेस के मतदाताओं ने भाजपा को रोकने के लिए एकतरफा वोट दिया
अनुमान था कि माकपा व कांग्रेस अपने गढ़ को बचायेगी पर हुआ उल्टा
कोलकाता : पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में इस बार भाजपा के कुछ ऐसे नतीजे आये जो पार्टी ने कभी सोचा भी नहीं होगा। अब हर कोई अलग – अलग कारणों पर मंथन कर रहा है। कोई दिल्ली के नेताओं के बंगाल आने को कारण बता रहा है ताे कोई कुछ और। पार्टी के आला नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक के बीच मंथन का सिलसिला जारी है। नेता से कार्यकर्ता और आम जनता तक, अपने – अपने हिसाब से भाजपा की इस बुरी तरह से हार का कारण ढूंढने में लगे हैं।
वाम व कांग्रेस नहीं बचा पाये अपना अस्तित्व
ये चुनाव वाममोर्चा व कांग्रेस के लिए एक तरह से अस्तित्व रक्षा की लड़ाई थी, लेकिन दोनों ही पार्टियां अपने अस्तित्व की रक्षा नहीं कर पायी। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में जहां वाममोर्चा को 19.75% (10,802,058 वोट) और कांग्रेस को 12.25% (6,700,938 वोट) मिले थे, वहीं इस बार के चुनाव में दोनों ही पार्टियों का पूरी तरह सूपड़ा साफ हो गया। 2016 में वाममोर्चा ने 26 सीटें जीती थीं जबकि कांग्रेस को 44 सीटें मिली थीं। दोनों को मिलाकर कुल 70 सीटें वाम-कांग्रेस के गठबंधन ने जीती थी, लेकिन इस बार राजनीतिक समीकरण पूरी तरह उलट गया। ना कांग्रेस को एक भी सीट मिली और ना ही वाममोर्चा को।
भाजपा विरोधी वोट गये तृणमूल के खेमे में
इस बार के चुनाव में भाजपा विरोधी वोट वाममोर्चा और कांग्रेस में न जाकर पूरी तरह तृणमूल के खेमे में चले गये। ऐसे में वोटों का विभाजन वाममोर्चा और कांग्रेस में नहीं हुआ जिसका पूरा लाभ तृणमूल को मिला। यही कारण रहा कि 10 वर्षों के शासन के बाद एंटी इनकम्बेंसी से गुजरने के बावजूद तृणमूल की सीटें कम होने के बजाय बढ़ गयी। 2016 में तृणमूल ने जहां 211 सीटें हासिल की थीं, वहीं इस बार 213 सीटें हासिल कर तृणमूल ने 2 सीटों की बढ़त बना ली।
अल्पसंख्यक वोट पूरी तरह गये तृणमूल में
पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में इस बार वोटों का ध्रुवीकरण कर भाजपा अपनी जीत पक्की मानकर चल रही थी और वोटों का ध्रुवीकरण हुआ भी। हालांकि यह बात अलग है कि इसका पूरा लाभ तृणमूल को मिला ना कि भाजपा को। सभी जिलों से अल्पसंख्यक वोट एकजुट हाेकर तृणमूल में गये जबकि हिन्दू वोटों का पूरी तरह से तृणमूल और भाजपा में विभाजन हो गया। राज्य में लगभग 27% मुस्लिम आबादी है जिनका पूरा साथ तृणमूल को मिला। केवल एक सीट भांगड़ से आईएसएफ के नौशाद सिद्दिकी ने जीत दर्ज की, लेकिन बाकी पूरे राज्य के मुस्लिम वोट एकमुश्त होकर तृणमूल में गये।
हिन्दीभाषी और बंगालियों ने भी दिया ममता का साथ
ममता बनर्जी ने केवल अल्पसंख्यक वोटों के दम पर जीत हासिल नहीं की बल्कि हिन्दीभाषियों और बंगालियों का भी पूरा साथ ममता को मिला। हिन्दीभाषियों का अधिकतर वोट तृणमूल के पास गया, इस कारण ही बैरकपुर और हावड़ा जैसे जिलों में भी भाजपा नाकाम रही जहां पार्टी अपनी स्थिति काफी मजबूत मानकर चल रही थी। इसके अलावा जो बंगाली वोटर हैं, जो इस बार काफी साइलेंट थे, उनका वोट भी दीदी के खेमे में ही गया।
महिला वोटरों ने निभायी अहम भूमिका
महिला वोटरों ने भी ममता बनर्जी को जिताने में अहम भूमिका निभायी। राज्य में 49% महिला वोटों को साधने की पूरी कोशिश भाजपा ने की, लेकिन इसमें भी वह सफल नहीं हो पायी। भाजपा की महिला नेताओं के बजाय दीदी का जुड़ाव राज्य की महिलाओं से अधिक हुआ और इसका सीधा लाभ तृणमूल को मिला।

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