…पर अफसर बनने के बाद भूल जाते हैं गुरु को

हाई कोर्ट के मामलों के आईने में दिखती है गुरुओं की पीड़ा
सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : कबीर दास का एक दोहा है : ‘गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।’ यानी गुरु की महिमा अपरंपार है। हाल ही में आए उच्च माध्यमिक के नतीजे में आए टॉपरों में से अधिकांश ने अपनी उपलब्धियों के लिए अपने गुरुओं का ही आभार जताया था। पर मुश्किल यह है कि अफसर बनने के बाद ये नौकरशाही के रंग में इस कदर रंग जाते हैं कि उन्हें गुरुओं की याद भी नहीं रह जाती है।
हाई कोर्ट में दायर बेशुमार मामलों के आईने में गुरुओं, यानी टीचरों, क‌ी इस पीड़ा को देखा जा सकता है। एडवोकेट प्रियंका अग्रवाल बताती हैं कि शिक्षा विभाग में नौकरशाही की श्रृंखला एस आई से शुरू होती है और शिक्षा विभाग के सचिव तक जाती है। पर टीचरों को ग्रेच्यूटी, पेंशन, तबादला और सर्विस बुक की गड़बड़ी जैसे बेहद मामूली मसलों के लिए हाई कोर्ट जाना पड़ता है। अफसर चाहे तो चुटकियों में इन मामलों को हल कर सकते हैं, पर उन्हें टीचरों का कोर्ट में चक्कर लगाना ज्यादा रास आता है। मसलन एक स्कूल के हेडमास्टर कमल शिट 2020 में 31 मार्च को सेवानिवृत्त हो गए पर ग्रेच्यूटी और पेंशन के लिए डेढ़ साल इंतजार करना पड़ा। इस बकाये पर ब्याज के लिए उन्हें हाई कोर्ट में रिट दायर करनी पड़ी। जस्टिस अमृता सिन्हा के आदेश के बाद ही इसका भुगतान हुआ। तबादले के मामले में टीचर अभिजीत दास को सिंगल बेंच के बाद जस्टिस टंडन के डिविजन बेंच में मामला दायर करना पड़ा। उन्होंने अपने फैसले में कहा था कि सभी कर्मचारियों के साथ और विशेष कर के तबादले के मामले में एक समान व्यवहार करना चाहिए। सरकार उठाओ और चुनो की नीति पर अमल नहीं कर सकती है। एक टीचर योगेंद्र कुमार शर्मा की नियुक्ति 1985 में हुई थी पर नियमितीकरण के लिए उन्हें हाई कोर्ट में रिट दायर करनी पड़ी। उनके पक्ष में 1994 में हाई कोर्ट का फैसला आया, पर इस पर अमल कराने के लिए उन्हें दोबारा 1998 में‌ रिट दायर करनी पड़ी। बहरहाल उनका मामला इस साल जनवरी में निपटा जब जस्टिस राजाशेखर मंथा ने उनके पक्ष में फैसला सुना दिया। टीचरों की इस पीड़ा पर जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय ने अपने एक फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा है कि टीचर, आर्थिक रूप से, बेहद कमजोर होते हैं और उनकी नौकरी के साथ की जाने वाली अनियमितताओं से निपटना उनके लिए बेहद मुश्किल होता है।

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