महानगरः ‘लाकडाउन’ हो या सख्ती​, परेशान व्यवसायी, केन्द्र मौन

इस बार व्यवसायी वर्ग को राहत देने के लिए एक कदम भी नहीं उठाये गये
सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : कोरोना महामारी के बाद पिछले साल की तरह इस बार भी विभिन्न राज्यों में लाकडाउन लग रहे हैं। अपना पश्चिम बंगाल इससे अछूता नहीं है। फर्क यह है कि यहां इसे लाकडाउन नहीं नाम देकर सख्ती कहा जा रहा है। सख्ती कहें या लाकडाउन इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि दोनों ही हालातों में व्यवसाय ठप है। व्यवसायी वर्ग परेशान है। कर्ज में डूबता जा रहा है यह वर्ग, लेकिन केन्द्र सरकार मानो मौन वर्त धारण किये हुए है। शायद वह व्यवसाइयों के और डूबने का इंतजार कर रही है। लाकडाउन पिछले साल केन्द्र सरकार ने लगाया था। इसके बाद केन्द्र सरकार की ओर से कुछ गाइडलाइन जारी हुईं थी। उसमें ईएमआई लेने समेत कई अन्य मामलों में भी व्यवसाइयों को राहत देने की कोशिश की गयी थी, लेकिन इस बार तो केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों के पाले में गेंद ठेल कर व्यवसायी वर्ग की परेशानी और बढ़ा दी है। भले ही इस बार राज्य सरकारें लाकडाउन लगा रही हैं, लेकिन गाइड लाइन तो केन्द्र सरकार ही निर्धारित कर रही है। बैंक समेत अन्य वित्तीय संस्थाएं केन्द्र सरकार के तहत काम करती हैं। इन पर राज्य सरकारों का कोई अधिकार नहीं है। कहने के लिए लाकडाउन या सख्ती राज्य सरकारें लागू कर रही हैं, लेकिन यह सब केन्द्र सरकार के दिशानिर्देशों के तहत ही हो रहा है। लेकिन केन्द्र सरकार व्यवसाइयों के राहत के लिए कोई कदम नहीं उठा रही है। तृणमूल के प्रवक्ता और विधायक विवेक गुप्त ने इस ओर केन्द्र सरकार का ध्यान दिलाते हुए पूछा है कि आखिर व्यवसायी वर्ग ने ऐसी क्या गलती कर दी है, जिसकी सजा इन्हें दी जा रही है। अगर व्यवसाय नहीं होगा, कारखाना या प्रतिष्ठान बंद रहेंगे तो कर्मचारियों से लेकर महाजन तक तथा बैंकों के ऋण का भुगतान कैसे होगा? अगर ईएमआई देने में छूट नहीं मिलेगी तो कहां से व्यवसायी ईएमआई जमा कर पायेंगे। अगर नहीं जमा कर पा रहे हैं तो कर्ज में और डूबते जायेंगे। सबसे अधिक कर देने वाले समाज के साथ इस तरह का बर्ताव क्यों हो रहा है? क्या केन्द्र सरकार जवाब देगी या मरने के लिए व्यवसाइयों को छोड़ देगी ?

 

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