… और शव को कंधा देने की जहमत भी नहीं उठायी

पुलिस ने उठायी अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी
सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : ‘मेरे मरने की खबर सुन कर वे मय्यत में भी नहीं आए, दुश्मन भी दो चार कदम की तकलीफ गंवारा करते हैं।’ हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और जस्टिस राजर्षि भारद्वाज के डिविजन बेंच के फैसले में इस शेर का अक्श नजर आता है। इसमें कहा गया है कि रमा बनर्जी के शव का अंतिम संस्कार करने का अनुरोध उनके सभी रिश्तेदारों और पिटिशनर से भी की जाए। अगर कोई नहीं आता है तो सरकार यह जिम्मेदारी उठा ले। पर कोई नहीं आया।
चीफ जस्टिस ने अपने फैसले की पहली लाइन में ही लिखा है कि यह एक बेहद दुर्भाग्यजनक घटना है कि रमा बनर्जी का शव पिछले सोलह माह से कटवा अस्पताल के मॉर्ग में पड़ा हुआ है। लिखा है कि एक रिपोर्ट के मुताबिक रमा बनर्जी बीमारी के कारण विस्तर पर पड़ी थी पर पूरी जानकारी के बावजूद देखभाल करने की बात तो दरकिनार रही उनका कोई भी रिश्तेदार उनसे मिलने तक नहीं आया। उनके कटवा के मकान में उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। यहां तक कि पिटिशनर माया मजुमदार भी रमा बनर्जी को मरने के बाद देखने तक के लिए अस्पताल में नहीं आई थी। इस फैसले के पहले पैरा में ही कहा गया है कि पिटिशनर के लगातार दखलंदाजी के कारण ही रमा बनर्जी का शव इतने दिनों तक मॉर्ग में पड़ा रहा। उसने रमा बनर्जी की पहचान और उनकी मौत को सामान्य मौत नहीं करार देते हुए पिटिशन दायर किया है जिसे ठोस साक्ष्य के अभाव में खारिज किया जाता है। रमा बनर्जी के शव की इतनी दुर्दशा एक छोटी सी संपत्ति के विवाद के कारण हुई है। अपनों ने साथ छोड़ दिया तो गैरों ने हाथ थाम लिया के तर्ज पर नूर हक मल्लिक ने रमा बनर्जी का हाथ थाम लिया था। अस्पताल में भर्ती कराने से लेकर मौत होने तक वह उनकी देख भाल करता रहा। रमा बनर्जी अविवाहित थी और लंबे समय से नूर हक मल्लिक अपने परिवार के साथ ही उनके मकान में रहता था। रमा बनर्जी ने कटवा के पाटिया रोड पर स्थित एक मकान के अपने हिस्से को नूर हक के नाम कर दिया था। माया मजुमदार का दावा है कि इस मकान में उनका भी हिस्सा है। इसे लेकर मामला दायर हुआ तो रमा बनर्जी ने कोर्ट में बयान दिया था कि उन्होंने होशोहवास में इस मकान के अपने हिस्से की बिक्री नूर हसन को की है। चीफ जस्टिस ने अपने फैसले में कहा है कि दस्तावेजों को देख कर यह साफ है कि सिर्फ संपत्ति विवाद को लेकर ही रमा बनर्जी के शव का अंतिम संस्कार नहीं हो पाया। सही है कि संपत्ति के लोभ पर सारी नैतिकताएं बलि चढ़ गईं।

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