70-80 सीटों पर है हिंदीभाषियों की निर्णायक भूमिका

 

कोलकाता : चुनावी रणनीति में कई समीकरण महत्व रखते हैं।  बंगाल में 34 सालों तक लाल परचम लहराता रहा मगर बांग्ला भाषा के अलावा किसी और भाषा को वह दर्जा नहीं मिला जो मिलना चाहिए। आखिरकार 2011 में पहली बार सत्ता में आयी तृणमूल सरकार ने हिंदी को वह मान दिया जिसकी हकदार बंगाल में हिंदी रही है। हिंदी की दिशा बढ़ाने के लिए तृणमूल सरकार तभी से काम करती आयी है मगर अब इसका दायरा और बढ़ाने के लिए पार्टी स्तर पर हिंदी प्रकोष्ठ का पुनर्गठन किया गया तो सरकारी स्तर पर हिंदी अकादमी को भी नया रूप दिया गया।
संस्कृति व भाषा को सम्मान देकर तृणमूल ने अपना बनाया
बंगाल ऐसा राज्य है जहां बड़ी संख्या में यूपी, बिहार, राजस्थान, गुजरात, पंजाब के लोग यहां दशकों से रह रहे हैं। बंगाल इनकी कर्मभूमि बन चुकी है। माना जाता है कि वोटरों का रूझान तभी पार्टी की तरफ होता है जब उनकी तरफ से संस्कृति व भाषा को सम्मान मिले। बंगाल में तृणमूल सरकार ने इसी नब्ज को पकड़ते हुए हिंदीभाषियों के हर पर्व को प्राथमिकता दी है। छठ पूजा की सरकारी छुट्टी उसी का हिस्सा है। वह क्षेत्र जहां 10 प्रतिशत से अधिक हिंदी बोलने वाले हैं वहां हिंदी भाषा का आधिकारिक तौर पर इस्तेमाल इसकी दूसरी कड़ी है और सबसे महत्वपूर्ण हिंदी प्रकोष्ठ का गठन जहां हिंदीभाषियों की हर समस्या को सुनने का माध्यम तैयार किया गया है।
तृणमूल ने विश्वास दिलाया हमारी पनाह में सुरक्षित है हिंदीभाषी
हिंदी प्रकोष्ठ हो या हिंदी अकादमी दोनों की सक्रियता बढ़ा कर तृणमूल ने हिंदीभाषियों को विश्वास दिलाने की कोशिश की है कि उनकी पनाह में ही समस्त हिंदीभाषी सुरक्षित है। उनकी समस्त समस्याओं का निदान उनकी सरकार करने में सक्षम है। सबसे बड़ी बात हिंदीभाषियों के सभी अधिकारों को तृणमूल महत्व देती है।
हिंदी समाज ने किया स्वागत
हिंदी प्रकोष्ठ और हिंदी अकादमी को जिस नये तेवर के साथ दोबारा लाया गया है, उस फैसले का हिंदीभाषी समाज ने खुले दिल से स्वागत किया है। उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी, मालदह, कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, अलीपुरदुआर हो या दक्षिण बंगाल का आसनसोल, दुर्गापुर, बर्दवान, रानीगंज। इधर बैरकपुर शिल्पांचल, कृष्णानगर, हुगली, हावड़ा यहां तक कि कोलकाता में भी सरकार के इस फैसले की जमकर तारीफ की​ है।
एक नजर बंगाल में हिंदीभाषियों पर

– यहां की कुल आबादी में से 1.5 करोड़ हिंदीभाषी हैं
– राज्य में हिंदीभाषी करीब 14 प्रतिशत हैं
– कुल विधानसभा सीटों में 70-80 सीट हैं जहां ये हिंदीभाषी निर्णायक भूमिका में हैं
– 150 के करीब विधानसभा की सीटें हैं जहां के वोटरों में हिंदीभाषी भी शामिल हैं

हिंदीभाषियों को बंगाल में मिला समान अधिकार

–    पहली बार ​किसी गैर हिंदीभाषी राज्य में हिंदी विश्वविद्यालय
–    आस्था का महापर्व छठ के लिए सरकारी छुट्टी
–    रोजगार के क्षेत्र में समान अवसर
–    उद्योग व व्यापार के क्षेत्र में उतना ही महत्व हिंदीभाषियों को जितना बांग्लाभा​षियों का स्थान
–    10% से अधिक हिंदीभाषी क्षेत्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा
–    राज्य में पहला हिंदी माध्यम जनरल डिग्री कॉलेज बनारहाट जलपाईगुड़ी
–    उत्तर बंगाल के हाथीघीसा में दूसरा हिंदी माध्यम कॉलेज बिरसा मुंडा हिंदी कॉलेज की स्थापना

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