57 साल पुरानी हॉकी बॉल आज भी किसी ऑलम्पिक ट्रॉफी से कम नहीं

हावड़ा : लक्ष्मीकांत दास के चेहरे पर आज भी 57 साल पुरानी घटना की चमक नजर आती है। वे कहते हैं कि टोक्यो के कोमाजवा हॉकी के मैदान में भारत व पाकिस्तना के बीच ओलम्प‌िक का फाइनल मैच हुआ था। भारत 1-0 से आगे था। जैसे ही फाइनल मैच की अंत‌िम क्षण में रेफरी ने खेल समाप्त होने की सींटी बजायी तभी दो लोग स्टैंड से दौड़कर मैदान में पहुंचे और हॉकी का गेंद लेकर गायब हो गए। वेटलिफ्टर लक्ष्मीकांत दास ले लगातार दूसरी बार 1960 के ओलम्प‌िक खेल में हिस्सा लिया था। अब फाइनल मैच के दौरान उठायी गयी गेंद ही उनकी ट्रॉफी है। उक्त गेंद को लेकर लक्ष्मीकांत टोक्सयो से वापस हावड़ा चले आए। हॉकी का बॉल लेकर भागने वालों में लक्ष्मीकांत के साथ-साथ मारुति माने भी थे। उक्त गेंद को लेकर लक्ष्मीकांत विजेता भारतीय टीम के कमरे में गए और कप्तान से गेंद पर हस्ताक्षर भी कराया था। पूर्व रेलवे के रिटायर्ड कर्मचारी ने बताया कि गेंद को रखने के लिए उनके वर्कशॉप मैनेजर ने कांच का विशेष ब़क्स बनाया। उक्त गेंद को लक्ष्मीकांत की दूसरी बेटी ने बॉक्स से निकालते हउए दिखाया। उस गेंद में अभी भी चरंजीत सिंह का हस्ताक्षर दिखता है। लक्ष्मीकांत दास ने बताया कि 1964 में फाइनल में पाकिस्तान को हराकर गोल्ड मेडल जीतना अभी भी हमें याद है। उक्त समय बारिश हो रहा है। इसलिए हमें छाता दिया गयाथा। भारत की जीत के बाद सभी ने छाता को हटा दिया था। हमारे जश्न मनाने की तस्वीर विभिन्न अखबारों में छापी गयी थी। मैसूर के महाराजा ने शराब की बोतल मंगाया था ज‌िसे लेकर खेल गांव में पार्टी की गयी थी। लक्ष्मीकांत बताते हैं कि एम्परर हिरोहितो ने खेल का उद्घाटन किया था।

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