पत्नी की हत्या कर कसायी से कटवाया था, प्रेमिका के साथ मिली फांसी की सजा

कुल 3 को फांसी की सजा
कोलकाता : सियालदह कोर्ट के एडीजे जीमूत बाहन विश्वास ने पत्नी की हत्या करने के आरोप में पति और उसके दो सहयोगियों को सोमवार को फांसी की सजा सुनायी। उनमें एक महिला भी शामिल है। सजा सुनाते समय एडीजे ने कहा कि यह विरल मामलों में से एक विरलतम मामला है। इसके लिए न्यूनतम सजा फांसी के अलावा कुछ और नहीं हो सकती है। दूसरी तरफ सियालदह कोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेटों के मुताबिक करीब पिछले पंद्रह सालों में पहली बार किसी महिला को फांसी की सजा सुनायी गई है।
एडीजे विश्वास ने सजा सुनाये जाने से पहले अभियुक्तों, पति सुरजीत देब, लिपिका पोद्दार और संजय विश्वास, से कहा कि अदालत ने साक्ष्यों पर गौर करने के बाद उन्हें दोषी पाया है। उन्हें इस बाबत कुछ कहना है क्या। इसके जवाब में अभियुक्तों ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा कि हत्या की इस घटना से उनका कोई सरोकार नहीं है। एडीजे ने उनकी इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि यह हत्या क्रूरता का एक ऐसा नमूना है जिसकी मिसाल बहुत कम मिलेगी। इसी लिए यह विरल से विरलतम मामला है। जज ने कहा कि बेहद अमानवीय तरीके से यह हत्या की गई। लाश को टुकड़े-टुकड़े करते समय उनके हाथ भी नहीं कांपे होंगे। हैरानी की बात तो यह है कि इस घिनावने कृत्य में एक महिला भी शामिल थी। जज ने अभियुक्तों को आईपीसी की धारा 302 और 120बी के तहत फांसी की सजा के साथ ही आईपीसी की धारा 201 के तहत सात साल जेल की सजा भी सुनायी। इसके अलावा उनमें से प्रत्येक पर 50-50 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया। जुर्माना नहीं अदा करने पर अतिरिक्त जेल की सजा भुगतनी पड़ेगी। पीपी तपन रॉय ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि सुरोजित देब और जयंती देब पत्ति-पत्नी थे। इसके बावजूद दोनों के विवाहेत्तर संबंध थे। इस वजह से दोनों में विवाद होता रहता था। लिहाजा वे अलग-अलग रहते थे। उनकी एक 16 वर्ष की बेटी भी थी। उसके हित और भविष्य का ख्याल रखते हुए दोनों ने एक साथ रहने का फैसला लिया। इसके बाद साथ रहने लगे, लेकिन 2014 में 19 मई की रात को उनमें किसी बात पर तकरार हुई और सुरोजित ने पीतल के किसी भारी बर्तन से पत्नी के सिर पर हमला कर दिया जिस वजह से उसकी मौके पर ही मौत हो गई। इसके बाद उसने लाश को ठिकाने लगाने की योजना बनायी। इसमें सहयोग के लिए वह अपनी प्रेमिका लीपिका पोद्दार के पास गया और उससे किसी कसाई के बारे में जानकारी मांगी। लिपिका ने उसे संजय विश्वास का ठिकाना बताया। आपस में करार होने के बाद तीनों ने जयंती के हाथ, पैर, गला और धड़ को काट कर एक ट्रॉली बैग में पैक किया और सियालदह स्टेशन के कार पार्किंग जोन के पास उसे छोड़ दिया। जब पुलिस ने ट्रॉली बैग खोला तो उसके अंदर महिला के शव के कटे हुए टुकड़े बरामद किए गए। मामले की जांच के दौरान ट्राली बैग में दर्जी की एक रसीद मिली थी। सियालदह जीआरपी पुलिस इसी रसीद के सहारे कातिलों तक पहुच गई। इसके बाद
सियालदह जीआरपीएस में चार्ज सीट दाखिल की गई। इस मामले में आई.ओ. तुलसीदास लाहा सहित 24 लोगों ने अपने बयान दर्ज कराए। करीब 5 साल तक चले मामले की सुनवायी के बाद सोमवार को अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनायी।

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