घातक हो सकता है अपना इलाज स्वयं करना

कोलकाता : अपनी सहेली दीपाली के बेटे अतुल की जन्मदिन पार्टी में जमकर समोसों और गोलगप्पों का आनंद लेने के बाद जैसे ही सलोनी घर पहुंची, उसे बेचैनी सी महसूस होने लगी। शायद ज्यादा खा लिया है, यही सोचकर सलोनी ने अपने पास रखी चूर्ण की गोलियां फाँकनी शुरू की लेकिन जब उसे थोड़ी देर बाद सीने में असहनीय दर्द महसूस होने लगा तो वह दर्द से छटपटाने लगी। उसके पैरों में बढ़ती सूजन को देखकर उसकी ननद देविका घबरा गई।
चिकित्सकीय उपचार से बची गर्भस्थ शिशु की जान
जैसे ही देविका ने फोन कर अपने फैमिली डॉक्टर को शीघ्र घर आने का अनुरोध किया तो सलोनी उस पर झल्ला उठी। वह विरक्ति भरे स्वर में बोल पड़ी, ‘इन दिनों हरेक का ही जी मिचलाता है। ऐसे में बेकार क्यों डॉक्टर को बुलाकर रुपयों का सत्यानाश करवा दिया।’
लेकिन जैसे ही डॉक्टर ने सलोनी का पूरा चेकअप करके उसे उच्च रक्तचाप का मरीज बताया तो सलोनी सकते में आ गई। खैर, तुरंत चिकित्सकीय उपचार मिलने पर सलोनी और उसके गर्भस्थ शिशु की जान बच गई।
डॉक्टर का खर्च बचाने पर जानलेवा हादसा होते-होते बचा
इसी तरह प्राइवेट कंपनी में काम करने वाली अंतरा के साथ भी जानलेवा हादसा होते-होते बचा। अंतरा को पिछले कई महीने से सिरदर्द होने की शिकायत थी लेकिन कौन डॉक्टर के पास जाकर फालतू में अपना पैसा और वक्त बर्बाद करे, यही सोचकर वह सिरदर्द होने पर टी.वी. में दिखाये जाने वाली दर्द निवारक गोलियों का सेवन कर लेती थी।
ब्रेन ट्यूमर को समझती रही साधारण सिर दर्द
एक दिन काम करते वक्त ऑफिस में ही जब अंतरा गश खाकर गिर पड़ी तो बॉस ने उसकी हालत देखकर तुरंत उसे पास के नर्सिंग होम में भिजवा दिया। वहां चेकअप के पश्चात् पता चला कि अंतरा के सिरदर्द की मूल वजह उसके सिर में पनपने वाला ब्रेन ट्यूमर है जो उसकी लापरवाही की वजह से काफी बढ़ चुका है। इसके अलावा खाली पेट, सिरदर्द की गोलियों के सेवन से उसके आमाशय को भी क्षति पहुंच चुकी है।
पुरुषों की तुलना में महिलाएं डॉक्टर के पास कम जाती हैं
सिर्फ सलोनी और अंतरा ही नहीं, हमारे देश में लाखों ऐसे स्त्री-पुरुष हैं जो साधन सम्पन्न व शिक्षित होने के बावजूद बीमार होने पर अपना इलाज किसी योग्य डॉक्टर से न कराकर स्वयं अपना इलाज, टी. वी. या पत्र पत्रिकाओं में दिखाये गये विज्ञापनों में दर्शाई गई दवाओं के सहारे करना बेहतर समझते हैं। जहां तक महिलाओं का सवाल है, वे इस मामले में पुरुषों की तुलना में बहुत कम ही डॉक्टर के पास जाना चाहती हैं।
अक्सर बच्चे भी करते हैं टी. वी. में दिखाई जाने वाली दवाइयों की मांग
सिरदर्द, पेटदर्द, कमरदर्द, पांवों में सूजन, पसलियों का दर्द, सांस फूलने, सर्दी-जुकाम जैसी शिकायत होने पर अक्सर बच्चे भी बड़ों की देखादेखी कैमिस्ट से टी. वी. में दिखाई जाने वाली दवाइयों की मांग करते हैं। कई बार मामूली तकलीफ या शारीरिक व्याधि में ये दवायें राहत भी पहुंचा देती हैं लेकिन लगातार शरीर के किसी भाग में सूजन, दर्द या बीमारी ठीक न होने पर कुशल चिकित्सक को दिखाना ही ज्यादा उचित होता है लेकिन पिछले कुछ वर्षों से डॉक्टर की सलाह या पर्ची के बिना शिक्षित व सम्पन्न लोगों में कफ ड्रॉप्स, मल्टी विटामिन के कैप्सूल, हैल्थ टॉनिक, पेनकिलर, कैल्शियम की गोलियां, कब्जनाशक टैबलट वगैरह लेने से इनकी बिक्री बढ़ती जा रही है।
डॉक्टर के पास जाने से इसलिए कतराती हैं महिलायें
डॉक्टर के पास इलाज न करवाने के पीछे कई ऐसे कारण हैं जिन पर भी गौर करना आवश्यक है। आज भी भारतीय परिवारों में महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की है। प्रारंभ से ही स्त्रियों को अपने बजाय, घर के अन्य सदस्यों की सेवा-टहल करने की शिक्षा दी जाती है। अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक महिला को आमतौर पर घर की बड़ी बुजुर्ग औरतें हेय नजरों से देखती हैं। इसके अलावा नारी सुलभ लज्जा, पारिवारिक प्रताड़ना का डर, समयाभाव, साथ में चलने वाली पारिवारिक सदस्य का न होना, चेकअप कराते वक्त किसी दूसरी बड़ी बीमारी निकल जाने की आशंका, डॉक्टर की महंगी फीस, टेस्ट व दवाइयों में रुपये खर्च होने का डर और घर के आसपास सरकारी चिकित्सालय की कमी जैसे कारणों के चलते महिलायें डॉक्टर के पास जाने से कतराती हैं।
लापरवाही से स्त्रियों का शरीर बनता है नाना व्याधियों का घर 
महिलाओं में अक्सर चटपटा या बासी बचा खुचा खाना खाने की जो प्रवृत्ति बनी हुई है, वह कालांतर में उनके शरीर को रोगी बना डालती है। हमारे देश में स्त्री के स्वास्थ्य के प्रति परिवारों में प्राय: लापरवाही बरती जाती है। प्रसव के दौरान पूर्ण आराम, पौष्टिक खानपान और चिकित्सकीय मदद न मिलने की वजह से स्त्रियों का शरीर नाना व्याधियों का घर बन जाता है। ऐसे में महिलायें संकोच की वजह से अपनी बीमारी किसी पुरुष, चाहे वह डॉक्टर ही क्यों न हो, से बताने में हिचकिचाती हैं। फलत: वे दूसरों की देखा देखी या विज्ञापनों में दिखाई गई दवाओं का चुपचाप सेवन करके ठीक होने की उम्मीद लगाये बैठी रहती हैं।
एक अनुभवी डॉक्टर ही कर सकता है किसी भी रोग का सही इलाज
इसके अलावा कई रोगों के लक्षण आपस में मिलते जुलते हैं जिसका निदान एक अनुभवी डॉक्टर ही कर सकता है जैसे-एनीमिया में सांस फूलने, थकावट होने, चक्कर आने जैसी शिकायत हो सकती है और हृदयरोग और टी. बी. में भी। पसलियों में दर्द की शिकायत न्यूमोनिया में भी हो सकती है और मांसपेशियों में आये खिंचाव के कारण भी हो सकती है। इसी तरह सिरदर्द होने की शिकायत ब्रेन ट्यूमर के कारण भी हो सकती है या नेत्ररोग या सर्दी लगने की वजह भी हो सकती है। ऐसी हालात में पेटेन्ट दवाइयां जहां इन रोगों में क्षणिक राहत पहुंचाती हैं, वहीं बिना सोचे समझे लंबे समय तक इनका इस्तेमाल दूसरी कई बीमारियों का कारण बन जाता है। कई बार किसी दवाई से मरीज को साइड इफेक्ट या एलर्जी हो सकती है। ऐसी परिस्थिति में दक्ष चिकित्सक तो दूसरी दवाई प्रेस्क्राइब कर सकता है लेकिन खुद अपनी चिकित्सा करने वाला तो इन तथ्यों से अनभिज्ञ होता है। इसके अलावा बहुत से लोग बीमारी से मुक्त होने पर भी दवाइयों का सेवन चालू रखते हैं जिससे भी शरीर को नुकसान पहुंचता है। विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली दवाओं के मोहजाल में न फंसकर उन्हें डॉक्टर की सलाहानुसार ही निर्धारित दवाइयों का सेवन करना चाहिये ताकि जल्द से जल्द रोगमुक्त हो सकें।

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