एक चिनगारी और सदियों पुराना मकान बना खण्डहर

कोलकाता : करीब 300 साल पुराने कोलकाता में बड़ाबाजार ऐसा क्षेत्र है जिसे बसाने से पहले न तो आधारभूत संरचना पर ध्यान दिया गया न ही आग या अन्य आपदाओं से निपटने के लिए उपायों पर जोर दिया गया। तब से अब तक समय बहुत आगे बढ़ा है। दमकल विभाग में आधुनिक अग्नि निरोधक उपकरण भी आये हैं मगर बात जब बड़ाबाजार की आती है तो प्रशासन को भी घुटने टेकने पड़ते हैं। आग या अन्य प्राकृतिक आपदाओं से निपटने वाले विभागीय अधिकारियों के लिए ऐसे वक्त में एक ही लाइन याद आती है ‘लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पायी’    इसका ताजा उदाहरण 27 फरवरी की रात 3 नंबर अमरतल्ला लेन में देखने को मिला जहां एक चिनगारी ने 3 मंजिला मकान को खण्डर में तब्दील कर दिया। मौके पर मौजूद दमकल के अधिकारियों ने सन्मार्ग को बताया कि हमारी तरफ से पूरी कोशिश की गयी कि आग पर काबू पाया जा सके मगर इलाके की आधारभूत संरचना के आगे हमें भी घुटने टेकने पड़े। हालांकि दमकल विभाग ने तत्परता दिखाते हुए किसी भी हाल में किसी शख्स को घायल होने नहीं दिया।

सिस्टम अपडेट है मगर इंफ्रास्ट्रक्चर सब फेल कर देता है

दमकल विभाग के सूत्रों ने बताया कि न सिर्फ बड़ाबाजार बल्कि पूरा उत्तर कोलकाता अनप्लांड तरीके से बनाया गया है। यहां आधारभूत संरचना नाम की कोई चीज ही नहीं है जिसके आगे दमकल विभाग को घुटने टेकने पड़ते हैं। इलाके की तंग व संकरी गलियों के बीच बिजली के बेतरतीब तारों के बीच दमकल की गाड़ियाें का जाना तो दूर की बात है, यहां पाइप फिट करना या पानी को ऊंचाई तक पहुंचाने तक में दमकल कर्मियों के पसीने छूट जाते हैं।

ट्रेड एसोसिएशन सदस्यों के साथ दमकल विभाग बढ़ाएगा जागरूकता

दमकल विभाग के डीजी जग मोहन ने सन्मार्ग को बताया कि 3, नंबर अमरतल्ला लेन की आग कोई छोटी घटना नहीं है। इससे बाकी के लोगों को सबक लेने की जरूरत है। भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोकथाम के लिए दमकल विभाग ट्रेड एसोसिएशन के सदस्यों के साथ मिलकर तत्परता बरतने के लिए जागरूकता बढ़ाएगा। इस कड़ी को स्कूलों में भी चालू किया जाएगा क्योंकि बड़ाबाजार इलाके में कई स्कूल भी हैं।

आग तो लगनी ही थी ‘लाल कुठी’ में… 

बड़ाबाजार इलाके में लगी भयावह आग का मंजर कुछ ऐसा था कि जिसने भी देखा वह पूरी तरह से कांप उठा। इस घटना में अमरतल्ला लेन की लाल कुठी पूरी तरह जलकर खाक हो गई। घटना के अगले दिन मौके पर पहुंची विधायक स्मिता बख्शी ने इस हादसे के लिए जागरूकता की कमी को काफी हद तक जिम्मेदार माना। उनका कहना था कि अगर लोग जागरूक रहते तो शायद यह घटना नहीं घटती। सरकार ने अगर अतिक्रमण को लेकर कोई नियम बनाया है तो वह आम लोगों की भलाई को लेकर ही है। सन्मार्ग ने इलाके की पड़ताल कर यह जानने की कोशिश की है कि किन कारणों से आग फैल सकती थी।
संकरी गली : यूं  तो बड़ाबाजार की गलियां ही काफी संकरी हैं लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि अमरतल्ला लेन में दुकानों के टीन के शेड और टीन की चादरों को खड़ा कर अतिक्रमण किया जा रहा है।
प्लास्टिक शेड : धूप और बरसात से बचने के लिए प्लास्टिक के शेड से इलाके की गलियों को ढंक दिया गया था जिन्हें इमारत में आग लगने के बाद फाड़ दिया गया था। प्लास्टिक एक ज्वलनशील पदार्थ है। इस वजह से आग बहुत तेजी से फैलता है। मुहम्मद अमीम ताई, जिनका खुद का खिलौनो का गोदाम पूरी तरह जल कर नष्ट हो गया, ने कहा कि बड़ाबाजार के अधिकांश इलाके में ऐसी ही स्थिति है जहां कभी भी इस घटना की पुनरावृत्ति हो  सकती है।
बिजली के तारों का जंजाल : अगर नजर दौड़ाई जाए तो इलाके भर में बिजली के तारों का जंजाल दिखता है। स्थानीय निवासी मुहम्मद इब्राहिम का आरोप है कि अगर किसी व्यक्ति का घर सड़क के एक किनारे और दूसरे किनारे पर दुकान है तो लोग अपने घर से बिजली के तारों को सड़क पार दुकानों तक लाते हैं। इस वजह से भी आग फैल सकती थी।
लकड़ी का ज्यादा इस्तेमाल : अमरतल्ला लेन की अधिकांश इमारतों में सीढ़ियां लकड़ी की बनी हुई हैं। सिर्फ सीढ़ियां ही नहीं इमारत में 70 प्रतिशत से ज्यादा लकड़ी का उपयोग किया गया है। इसका एक नुकसान यह है कि आग लगने की इस प्रकार की घटनाओं में अगर आग सिर्फ निचले तल्ले में हो, ऊपर वाले तल्ले तक न पहुंची हो लेकिन आग की वजह से अगर सीढ़ियां जल गई हों तो ऊपर फंसे लोग सीढ़ियां जल जाने की वजह से तब तक बाहर नहीं भाग सकते। कुछ ऐसा ही इस मामले में भी हुआ। इसके अलावा इमारत में लकड़ी का प्रयोग ज्यादा  होने के कारण लकड़ियों के जल जाने के तुरंत बाद इमारत ढहने लगी।
ज्वलनशील पदार्थ : स्थानीय लोगों के अनुसार ‘लाल कुठी’ में लोग न सिर्फ रहते थे बल्कि ज्वलनशील पदार्थों के गोदाम भी हैं जिनमें प्लास्टिक के खिलौने, बैग, कागज से बने कार्टून आदि थे। इनकी वजह से आग और भी अधिक फैल गई। इसके अलावा सिलेंडरों का फटना भी प्रमुख कारण है। रोशन अली दैय्या ने बताया कि इमारत के पीछे की तरफ जो गोदाम है वहां लोगों के सामान अभी तक फंसे हुए हैं।

लाल कोठी : टीपू सुल्तान के वंशज भी कभी थे यहां?

1895 में निर्मित वक्फ बोर्ड के अंतर्गत 3, अमरतल्ला लेन 200 साल से अधिक पुराना है। स्थानीय लोग बताते हैं कि संभवतः यह टीपू सुल्तान के वंशजों से भी जुड़ा हुआ है। व्यवसायी एम.के.टिबड़ेवाल ने बताया कि कहा जाता है कि टीपू सुल्तान की पौत्री के वंशज ही किसी समय इस भवन के मालिक थे। हालांकि ऐसी स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी है। आज भी क्षेत्र के लोग वक्फ बोर्ड के प्रमुख हाजी काशिम आरिफ को नवाब साहब के तौर पर ही बुलाते थे। अब अशरफ आरिफ नवाब ने कहा कि सभी अपनों की तरह हैं। 3, अमरतल्ला लेन का इतिहास काफी पुराना है। इसकी स्थापत्य कला मुगलकालीन कला पर आधारित नजर आती है। आस-पास की इमारतों में यह सबसे पुरानी इमारत भी कही जा सकती है। नाखुदा मस्जिद के इमाम नूर आलम ने कहा कि इस बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है। हालांकि आज भी बंगाल में टीपू सुल्तान के वंशजों के तार जुड़े हुए मिलते हैं। इस भवन को नवाबों का भवन कहा जाता है। फिल्म अभिनेत्री नर्गिस सहित कई फिल्म कलाकार भी यहां रह चुके हैं। यहां के वंशजों का संपर्क टीपू सुल्तान से जुड़ा हुआ है।
अनुसंधानकर्ताओं की नजर से दूर कैसे?
सवाल यह भी उठ रहा है कि इतनी पुरानी इमारत अनुसंधानकर्ताओं की नजर से दूर कैसे रही। बंगाल अपने आप में कई इतिहास को संजोए हुए है। ब्रिटिशकालीन कला के अनूठे नमूने यहां देखने को मिलते हैं। मुगलकालीन कला पर निर्मित कई भवन भी यहां देखे जा सकते हैं। इतिहासकारों की मानें तो यह एक बड़ा मौका था जिस पर अनुसंधानकर्ता अपना अनुसंधान कर सकते थे। टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम मौलाना नुरूर रहमान बरकती बताते हैं कि इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कभी टीपू सुल्तान के वंशज भी यहां रहे हों। n

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