अल्पसंख्यकों काे अपनी ओर जोड़ने के लिए भाजपा ने बनायी रणनीति

 

कोलकाता : भाजपा बंगाल में अपनी पैठ और मजबूत करने के लिए सदस्यता अभियान तो चला रही है, लेकिन जहां तक अल्पसंख्यकों की बात है तो अब भी उन्हें भाजपा पूरी तरह अपनी ओर नहीं कर पायी है। फिलहाल राज्य भर में लगभग 4 लाख अल्पसंख्यक भाजपा से जुड़े हुए हैं। हालांकि अब प्रदेश भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा ने दिसम्बर तक 20 लाख अल्पसंख्यकों को भाजपा से जोड़ने का टार्गेट रखा है। प्रदेश भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष अली हुसैन ने सन्मार्ग को बताया कि हाल के दिनों में काफी संख्या में शिक्षित और बुद्धिजीवी अल्पसंख्यक भाजपा में शामिल हुए हैं। उन्होंने कहा, ‘सीएए के संबंध में लोगों को भ्रमित किया गया। इससे अल्पसंख्यकों का कोई लेना – देना नहीं है और देश का कोई नागरिक इससे प्रभावित नहीं होगा। लॉकडाउन के समय में काफी अल्पसंख्यकों को यह बात समझ में आ गयी है। इसके अलावा काफी संख्या में शिक्षित अल्पसंख्यक हमारी पार्टी में शामिल हुए हैं।’
कई कारणों से भाजपा में आ रहे हैं अल्पसंख्यक
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो कई ऐसे कारण हैं जिससे अल्पसंख्यक भाजपा में जुड़ रहे हैं। इनमें अहम कारण है दूसरी पार्टियों के बीच अंतर्द्वंद्व। अन्य कारणों में अली हुसैन ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनकल्याणकारी नीतियों के कारण भी अल्पसंख्यक भाजपा से जुड़ रहे हैं।
भाजपा में बड़े नाम सक्रिय नहीं
भाजपा के वरिष्ठ नेता मुकुल राय ने लाभपुर के तृणमूल विधायक मनिरुल इस्लाम को दिल्ली में भाजपा में शामिल करवाया था जिसे लेकर खूब हंगामा भी मचा था। हालांकि इसके बाद वह कभी भाजपा में सक्रिय नहीं दिखे। ऐसे में यह स्पष्ट है कि भाजपा में बड़े नाम सक्रिय नहीं हैं।
बंगाल में कुल 28 फीसदी अल्पसंख्यक वोट
राज्य में लगभग 28% अल्पसंख्यक वोट हैं। इनमें से अगर भाजपा 5% वोट में भी सेंध लगा पायी तो विधानसभा चुनावों के परिणाम काफी अलग हो सकते हैं। गत लाेकसभा चुनाव में माकपा और कांग्रेस भी अधिक अल्पसंख्यक वोट अपनी ओर नहीं कर पायी थी। ऐसे में तृणमूल के खाते में अधिक अल्पसंख्यक वोट गये थे। हालांकि इस बार क्या परिणाम होंगे, यह समय ही बता पायेगा।
2019 में तृणमूल को मिले थे 70% अल्पसंख्यक वोट
2019 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल को लगभग 70% अल्पसंख्यक वोट मिले थे। वही कांग्रेस को 20% और वाममोर्चा
को 5% वाेट मिले थे। ऐसे में यह स्पष्ट है कि इस बार तृणमूल के अल्पसंख्यक वोटों में सेंध
लगाना भाजपा के लिए कड़ी चुनौती होगी।

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