क्रिकेट न होता तो बालकनी से कूदकर दे देता जान : रॉबिन उथप्पा

नयी दिल्ली : भारत के लिए 46 वनडे और 13 टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुके रॉबिन उथप्पा ने बताया कि अपने पेशे में वह दो वर्ष तक अवसाद और आत्महत्या के विचारों से संघर्ष करते रहे जब क्रिकेट ही एकमात्र वजह थी जिसने उन्हें ‘बालकनी से कूदने’ से रोका था। उथप्पा ने रॉयल राजस्थान फाउंडेशन के लाइव सत्र ‘माइंड , बॉडी एंड सोल’ में कहा, ‘मुझे याद है 2009 से 2011 के बीच यह लगातार हो रहा था और मुझे रोज इसका सामना करना पड़ता था। मैं उस समय क्रिकेट के बारे में सोच भी नहीं रहा था।’
क्रिकेट ने दी हिम्मत
उन्होंने कहा, ‘मैं सोचता था कि इस दिन कैसे रहूंगा और अगला दिन कैसा होगा , मेरे जीवन में क्या हो रहा है और मैं किस दिशा में आगे जा रहा हूं। क्रिकेट ने इन बातों को मेरे जेहन से निकाला। मैच से इतर दिनों या आफ सीजन में बड़ी दिक्कत होती थी।’
दौड़कर जाऊं और बालकनी से कूद जाऊं
उथप्पा ने कहा, ‘मैं उन दिनों में इधर-उधर बैठकर यही सोचता रहता था कि मैं दौड़कर जाऊं और बालकनी से कूद जाऊं। लेकिन किसी चीज ने मुझे रोके रखा।’
मुझे अपने नकारात्मक अनुभवों का कोई मलाल नहीं
उन्होंने कहा, ‘मैंने एक इंसान के तौर पर खुद को समझने की प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद बाहरी मदद ली ताकि अपने जीवन में बदलाव ला सकूं।’उन्होंने कहा, ‘पता नहीं क्यों, मैं कितनी भी मेहनत कर रहा था लेकिन रन नहीं बन रहे थे। मैं यह मानने को तैयार नहीं था कि मेरे साथ कोई समस्या है। हम कई बार स्वीकार नहीं करना चाहते कि कोई मानसिक परेशानी है।’ उन्होंने कहा, ‘मुझे अपने नकारात्मक अनुभवों का कोई मलाल नहीं है क्योंकि इससे मुझे सकारात्मकता महसूस करने में मदद मिली। नकारात्मक चीजों का सामना करके ही आप सकारात्मकता में खुश हो सकते हैं।’

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