

मल्टीपल मायलोमा एक गंभीर लेकिन अक्सर अनदेखा किया जाने वाला रक्त कैंसर है, जो बोन मैरो में बनने वाली प्लाज्मा कोशिकाओं को प्रभावित करता है। इसके शुरुआती लक्षण हल्के और अस्पष्ट होते हैं, इसलिए कई बार मरीजों में बीमारी का पता देर से चलता है। विशेषज्ञों के अनुसार, जागरूकता और समय पर जांच से इस साइलेंट कैंसर के गंभीर प्रभावों को काफी हद तक रोका जा सकता है। पीयरलेस हॉस्पिटल, कोलकाता की कंसल्टेंट हेमेटोलॉजिस्ट डॉ. शाजिया गुलशन ने कहा, मल्टीपल मायलोमा में प्लाज्मा कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं, जिससे शरीर की संक्रमण से लड़ने की क्षमता कमजोर हो जाती है और हड्डियां, किडनी व अन्य अंग प्रभावित होने लगते हैं। शुरुआत में लक्षण बहुत सामान्य होते हैं, इसलिए मरीज अक्सर इसे नजरअंदाज कर देते हैं। डॉ. गुलशन ने बताया कि, इस बीमारी को समझने के लिए क्रैब (सीआरएबी) लक्षणों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है।
उन्होंने बताया, कैल्शियम का बढ़ना, किडनी की खराबी, एनीमिया और हड्डियों में दर्द या फ्रैक्चर, ये मल्टीपल मायलोमा के प्रमुख संकेत हो सकते हैं, जिन्हें कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। इलाज को लेकर उन्होंने कहा, मल्टीपल मायलोमा को पूरी तरह ठीक करना अभी संभव नहीं है, लेकिन आधुनिक इलाज जैसे टार्गेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट से मरीज लंबे समय तक बेहतर और सक्रिय जीवन जी सकते हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा, लगातार हड्डियों में दर्द, बिना वजह खून की कमी, बार-बार संक्रमण या किडनी से जुड़ी समस्याएं, विशेषतौर पर 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में तुरंत जांच की मांग करती हैं। समय पर निदान से इलाज के नतीजे काफी बेहतर हो जाते हैं।