नेपाल में चीन बड़ा प्लेयर बनकर उभर रहा

नईदिल्‍ली : रोटी और बेटी के रिश्ते के बीच में आया ड्रैगन। ऐसे में ड्रैगन इंपैक्‍ट में पड़ने से दोनों देश के बीच संबंधों में तल्‍खी आ रही है। इसका ताजा असर की नेपाल ने युद्धाभ्यास में हिस्सा नहीं लिया। वहीं बिम्सटेक सदस्य देशों की थलसेनाओं ने सोमवार से पुणे के पास औंध में एक सप्ताह का आतंकरोधी युद्धाभ्यास शुरू किया। बता दें कि बिम्सटेक भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, थाइलैंड, भूटान और नेपाल का क्षेत्रीय संगठन है। इसका मकसद क्षेत्र में आतंकवाद की चुनौतियों से सदस्‍य देशों के निपटने में सहयोग को बढ़ाना है। इस युद्धाभ्यास की योजना करीब दो सप्ताह पहले बिम्सटेक देशों की बैठक में बनी। सदस्‍य देशों के नेताओं ने काठमांडू में अपनी शिखर वार्ता में आतंकवाद से असरदार तरीके से निपटने के लिए हाथ मिलाने का संकल्प लिया था। लेकिन नेपाल ने इस युद्धाभ्यास में हिस्‍सा नहीं लिया। नेपाल के इस रुख के कई मायने हैं। इसे चीन के बढ़ते प्रभाव के रूप में देखा जा रहा है। भारत का नेपाल के साथ रोटी और बेटी का रिश्‍ता रहा है। लेकिन क्या कारण रहे कि इस तल्‍खी की वजह। इसके कई वजह और मायने निकले जा रहे हैं।

चीन बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश कर रहा नेपाल में
नेपाल में चीन बड़ा प्लेयर बनकर उभर रहा है। यह भारत के लिए सिरदर्द है। दरअसल, नेपाल में नए संविधान लागू होने के बाद से भारत के साथ कुछ दूरियां बढ़ी हैं। नेपाल में नए संविधान लागू होने के बाद भारत ने कुछ क्षेत्रों में आर्थिक नाकेबंदी लगाई। इस कारण यहां भारत के विरोध में एक माहौल बना। इसके बाद ही नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने चीन के साथ व्‍यापारिक समझौते पर करार किया। चीन की उपस्थिति नेपाल में बढ़ी है। चीन यहां बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश कर रहा है। निश्चित रूप से यह स्थिति भारत के लिए चिंताजनक है। चीन की दक्षिण एशियाई देशों में दिलचस्‍पी खासकर नेेपाल के साथ उसकी दोस्‍ती यहां के परंपरागत शक्ति संतुलन पर असर डाल सकती है।

नेपाल में भारत की छवि माइक्रो मैनेजर के रूप भी तल्‍खी की एक वजह
नेपाल और भारत का रिश्ता बहुत पुराना है। लेकिन राजनीतिक और कूटनीतिक संबंधों में काफी उतार-चढ़ाव आए हैं। भारत ने सदैव से नेपाल के साथ एक बड़े भाई के रोल का निर्वाह किया। इसके अलावा भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक कारणों से भारत के लिए नेपाल एक खास महत्‍व रखता है। नेपाल में एक परंपरा रही है कि वहां प्रधानमंत्री अपने विदेश दौरों की शुरुआत भारत के दौरे के साथ करते हैं। लेकिन करीब एक दशक से यहां के हालात में बदलाव देखा गया है। नेपाल में एक तबका भारत विरोधी छवि को हवा देता रहा है। उसने नेपाल में भारत की छवि को एक बड़े भाई की जगह माइक्रो मैनेजर के रूप में स्‍थापति किया। इस माइक्रो मैनेजर की छवि से नेपाल में भारत काफी अलोकप्रिय किया गया। नेपाल में भारतीय हस्तक्षेप को खारिज करने की कोशिशें की गई।

नेपाल के प्रधानमंत्री चीन और पाकिस्तान में दिखा रहे दिलचस्पी
वर्ष 2006 तक भारत-नेपाल संबंध बेहतर रहे हैं। इस समय तक नेपाल के आंतरिक मामलों में भारत की निर्णायक हैसियत होती थी। लेकिन उसके बाद से नेपाल में राजनीतिक परिवर्तन का दौर चला। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के हाथ में नेपाल की कमान आई। ओली के बारे में कहा जाता है कि नेपाल को चीन के करीब ले जाने में उनकी दिलचस्पी रही है। ओली के बारे में भी यह भी धारणा स्‍थापित है कि वो चुनाव भारत विरोधी भावना के कारण ही जीते हैं। ओली के सत्ता संभालने के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नेपाल पहुंचने वाले पहले राष्ट्र प्रमुख थे। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का नेपाल दौरा उस वक्‍त हुआ, जब भारत के साथ पाक के रिश्‍ते काफी तल्‍ख चल रहे थे। नेपाल में हुए आम चुनाव में ओली दूसरी बार सत्‍ता में आए।

नेपाल ने किया चीन के वन बेल्ट वन रोड का समर्थन
भारत चीन की महत्‍वाकाक्षी परियोजना वन बेल्‍ट वन रोड का भी विरोध कर रहा है। चीन की ओबीओआर परियोजना को लेकर भारत ने संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सवाल उठाया । लेकिन इस मामले में नेपाल की राय भारत से जुदा है। वह परियोजना में चीन के साथ खड़ा है। ओली अपने पहले कार्याकाल में ही चीन के दौरे पर गए। उन्‍होंने यह भी इच्‍छा जाहिर की कि चीन तिब्बत के साथ अपनी सड़कों का जाल फैलाए और नेपाल को भी जोड़े ताकि भारत पर से उसकी निर्भरता कम हो। दरअसल, ‘वन बेल्‍ट वन रोड’ परियोजना के जरिए चीन पूरी दुनिया में अपनी पहुँच बढ़ाना चाहता है। यह एशिया, यूरोप और अफ़्रीका के 65 देशों को जोड़ने वाली योजना है। इसे न्यू सिल्क रूट नाम से भी जाना जाता है। देखा जाए तो ओबीओआर एक ही परियोजना नहीं है, बल्कि छह आर्थिक गलियारों की मिली-जुली परियोजना है, जिसमें रेलवे लाइन, सड़क, बंदरगाह और अन्य आधारभूत ढाँचे शामिल हैं। ओबीओआर में तीन जमीनी रास्ते होंगे। इसकी शुरुआत चीन से होगी। इसका पहला मार्ग मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप के देशों की ओर जाएगा। इससे चीन की पहुँच किर्गिस्तान, ईरान, तुर्की से लेकर ग्रीस तक हो जाएगी। दूसरा मार्ग मध्य एशिया से होते हुए पश्चिम एशिया और भूमध्य सागर की ओर जाएगा। इस रास्ते से चीन, कज़ाकस्तान और रूस तक जमीन के रास्ते कारोबार कर सकेगा। तीसरा मार्ग दक्षिण एशियाई देश बांग्लादेश की तरफ जाएगा। साथ ही पाकिस्तान के सामरिक रूप से महत्वपूर्ण बंदरगाह ग्वादर को पश्चिमी चीन से जोड़ने की योजना पर काम चल ही रहा है।

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