जिसने रुहेलखंड जीता, सत्ता उसी की

यूपी चुनाव: दूसरे चरण के लिए सियासी अखाड़े में कूदे 720 प्रत्याशी, 256 करोड़पति

उत्तरप्रदेश के सियासी दंगल के दूसरे चरण के अखाड़े के लिए रुहेलखंड तैयार है। यहां 11 जिले की 67 सीटों पर अाज मतदान होगा। इतिहास गवाह है कि जिस पार्टी के हिस्से में रुहेलखंड की अधिक से अधिक सीटें आई हैं, प्रदेश में उसी की सरकार बनी। पिछले चार चुनावों के आंकड़े तो यहीं कहते हैं। 1996 में भाजपा, 2002 में सपा, 2007 में बसपा और 2012 में सपा ने रुहेलखंड में सर्वाधिक सीटें हासिल की थीं और इन वर्षों में उन्हीं की सरकार भी बनी थी। बरेली में एक रैली में मुलायम सिंह यादव ने भी इस सच को स्वीकारा था। मायावती भी रैलियों में इस बात को मान चुकी हैं। रुहेलखंड में इस बार भी दिलचस्प चुनावी जंग देखने को मिल रही है। बसपा, सपा और भाजपा के दिग्गज नेता अपने प्रत्याशियों की जीत के लिए अपील करते नज़र आ रहे हैं और उनमें साम, दाम, दंड, भेद से सीटें निकालने की होड़ मची हुई है। सतीश राय की रिपोर्ट…

बसपाः वोट के पहाड़ पर हांफता हाथी

उत्तर प्रदेश के महासमर में रुहेलखंड की सरजमीं पर ‘हाथी’ पूरी तरह मस्त चाल कभी नहीं चल पाया। मुस्लिम मतदाताओं को अपने पाले में करने की हर कोशिश कर रहीं मायावती ने तो जीत का फॉर्मूला ही दलित-मुस्लिम गठजोड़ को बनाया है। मायावती के समर्थन में दिल्ली जामा मस्जिद के शाही इमाम ने कहा है कि मुझे विश्वास है कि मुस्लिम हितों की रक्षा बीएसपी कर सकती है। कुछ ऐसे ही बोल नेशनल उलेमा काउंसिल के भी हैं जिसने मायावती के समर्थन में अपने 84 उम्मीदवारों को मैदान से हटाने का फैसला किया है। राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल और सैयद बुखारी से पहले अंसार रजा, कल्बे जव्वाद जैसे मुस्लिम धर्म गुरु भी मायावती के पक्ष में वोट देने की अपील कर चुके हैं। मौजूदा सियासी हालात में जिस तरह भाजपा और सपा फ्रंटफुट पर खेल रही हैं। देखना होगा, हाथी उन्हें किस ढंग से पछाड़ पाता है।

सपाः रुहेलखंड में बढ़त बचाने की चुनौती

मुलायम, अखिलेश इस इलाके का सिरमौर आजम खान को ही मानते हैं। 1985 से आजम खान रामपुर से विधायक हैं। ऐसे में सबकी नजर रहेगी कि क्या वे इस बार रामपुर जिले में सपा की सीटें बढ़ा पाएंगे। 2012 में 67 में से 34 सीटें पार्टी के कब्जे में आई थीं। रामपुर की स्वार सीट पर ही कसक बाकी रही थी, जहां से रामपुर के नवाब काजिम अली खान (नवेद मियां) कांग्रेस से जीते थे। अलग-अलग दलों से चार बार से स्वार के विधायक नवेद मियां इस बार हाथी पर सवार हैं। नवाबी दुर्ग को ढहाने के लिए आजम ने सिविल इंजीनियर छोटे बेटे अब्दुल्लाह आजम को मैदान में उतारा है। मुस्लिम बहुल रुहेलखंड में बीजेपी की कोशिश ध्रुवीकरण की रही है तो क्या इस बार ध्रुवीकरण की धार से बीजेपी और मुसलमानों के बीच कड़ी मेहनत से बीएसपी, सपा का खेल बिगाड़ देगी?

भाजपाः सपा के किले में सेंध लगा पाएगी

14 साल बाद यूपी में सत्ता हासिल करने की कोशिश में जुटी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि इस चरण में उनका मुकाबला सीधे बसपा से है। 2012 के परिणामों पर नजर डालें तो तीन सीटों संभल, बदायूं और रामपुर ऐसे जिले की 15 सीटों पर लोग सपा पर भी भरोसा जताते आए हैं। भाजपा यहां विकास के मुद्दे को जोर-शोर से उठा रही है। इलाके के लोगों का कहना है कि यहांं सड़कों और बिजली की स्थिति तो सुधरी है, लेकिन बेरोजगारी चरम पर है। भाजपा अपनी रैलियों में इसी मद्दे को हवा देने में जुटी है। इसके अलावा भाजपा रुहेलखंड में पिछड़ी जातियों को भी लुभाने की कोशिश में है। भाजपा भले ही विकास की बात कर रही है लेकिन उसके रणनीतिकारों को लगता है कि हिंदू जातियों को साध कर केवल ध्रुवीकरण के जरिए ही रुहेलखंड इलाके में अपनी जमीन मजबूत की जा सकती है।

दूसरे चरण में भी मुस्लिम फैक्टर अहम

इन 67 सीटों पर सत्ता की चाबी मुस्लिमों और दलितों के हाथ में होती है। इसमें भी बड़ी भूमिका यहां के 36 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं की है। इन 11 जिलों में 6 जिले मुस्लिम बहुल जिले हैं। इसमें से रामपुर में 51 फीसदी, मुरादाबाद में 47%, बिजनौर में 43%, सहारनपुर में 42%, अमरोहा में 41% और बरेली में 35 फीसदी मुसलमान हैं। इसी वजह से यहां बसपा ने 26, सपा-कांग्रेस गठबंधन ने 25 और रालोद ने 13 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। 13 सीटे ऐसी हैं जहां सपा-कांग्रेस और बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार आमने-सामने हैं। यानी मुस्लिम वोटों की असली लड़ाई उन 13 सीटों पर हैं जहां सपा-बसपा दोनों ने ही मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। इसके अलावा दूसरे चरण में बरेलवी मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी भूमिका रहेगी। इन 11 जिलों में सहारनपुर में देवबंदियों का जबकि बाकी 10 जिलों में बरेलवी मुसलमानों में करीब 80 फीसदी बरेलवी मुसलमान हैं।

‘वीआईपी’ उम्मीदवार भी, परदे के पीछे से जोर भी

इस चरण में जिन कद्दावर नेताओं की किस्मत का फैसला होना है, उसमें सपा सरकार के वरिष्ठ मंत्री आजम खां (रामपुर), उनके पुत्र अब्दुला आजम (स्वार), कांग्रेस के जफर अली नकवी के बेटे सैफ अली नकवी, पूर्व केन्द्रीय मंत्री जितिन प्रसाद (तिलहर) और बीजेपी विधान दल (शाहजहांपुर नगर) के नेता सुरेश खन्ना हैं। अमरोहा में कैबिनेट मंत्री कमाल अख्तर और महबूब अली, पीलीभीत में कैबिनेट मंत्री हाजी रियाज सदर सीट से और राज्यमंत्री हेमराज वर्मा बरखेड़ा से, बदायूं की सहसवान सीट से मंत्री ओमकार सिंह यादव और शाहजहांपुर की ददरौल सीट से मंत्री राममूर्ति वर्मा, मुरादाबाद नगर से बाहुबली मुख्तार अंसारी के भाई बीएसपी के अतीक अहमद मैदान में हैं।  पीलीभीत की सांसद और केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी, बरेली के सांसद और केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार, शाहजहांपुर की सांसद और केंद्रीय मंत्री कृष्ण राज और बदायूं के सांसद धर्मेंद्र यादव परदे के पीछे से जोर लगा रहे हैं क्योंकि इनकी प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है।

एक नजर…

– 11 जिलों – सहारनपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, संभल, रामपुर, बरेली, अमरोहा, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, शाहजहांपुर और बदायूं की 67 सीटों के लिए 15 फरवरी को मतदान
– कुल 720 उम्मीदवार मैदान में
– सर्वाधिक 22 बिजनौर की बरहपुर और सबसे कम 4 अमरोहा की धनौरा सीट पर
– हर सीट पर औसतन 11 प्रत्याशी
– कुल 2.28 करोड़ मतदाता, इनमें से 1.04 करोड़ महिला मतदाता
– मुरादाबाद व रामपुर में 50% और अमरोहा व बिजनौर में 40% मुस्लिम आबादी
गौरतलब है कि पिछले चुनाव में सत्तारूढ समाजवादी पार्टी को 34 सीटें मिली थी जबकि दूसरे नम्बर पर रही बसपा को 18, भाजपा को 10, कांग्रेस को 3 और अन्य को 2 सीटें मिली थी।

720 प्रत्याशियों की कुंडली

720 प्रत्याशियाें की तरफ से दाखिल हलफनामे का उत्तर प्रदेश इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने विश्लेषण किया। जिसमें…
– कुल 720 प्रत्याशी मैदान में हैं, जिनमें छह राष्ट्रीय दलों, छह प्रादेशिक दलों, 80 गैर मान्यता प्राप्त दलों के और 206 स्वतंत्र हैं।
-107 प्रत्याशियों (15 फीसदी) पर अापराधिक मामले दर्ज हैं।
-84 प्रत्याशियों (12 फीसदी) पर हत्या व हत्या के प्रयास के गंभीर अपराध हैं।
– इनमें भाजपा के 16, बसपा के 25, रालोद के छह, सपा के 21, कांगेस के छह और 206 निर्दलीयों में से 13 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
-कुल प्रत्याशियों में से 256 करोड़पति जिनकी औसत संपत्ति दो करोड़ रुपये है।
– सर्वाधिक बसपा के 58 प्रत्याशी करोड़पति हैं।
-भाजपा के 50, सपा के 45, कांग्रेस के 13 व 36 निर्दलीय प्रत्याशी करोड़पति हैं।
-174 प्रत्याशियों ने अपना स्थाई आयकर खाता नंबर (पैन) नहीं बताए हैं।

रुहेलखंड की राजनीतिः अतीत के झरोखे से, रुहेलखंड ने कब-कब किसके सिर रख्‍ाा ताज

1996

भाजपा ने बरेली मंडल की 11 सीटों पर कब्जा किया था। किसी दल को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हुआ था और राष्ट्रपति शासन लग गया था। एक साल बाद भाजपा और बसपा ने मिलकर सरकार बनाई थी। उस समय भाजपा ने मंडल में बदायूं, बिनावर, आंवला, सन्हा, बरेली शहर, भोजीपुरा, कांवर, बहेड़ी, पीलीभीत, निगोही, शाहजहांपुर सीट कब्जाई थी।

2002

सपा को 12 सीटों पर जीत मिली थी। तब भी किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला और 56 दिन तक प्रदेश राष्ट्रपति शासन के दौर में रहा। उसके बाद एक साल तक मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री रहीं। समर्थन वापसी के बाद मुलायम सिंह ने सरकार बनाई। उस समय सपा की मंडल की बिसौली, सहसवान, बिल्सी, उसहैत, दातागंज, फरीदपुर, नवाबगंज, भोजीपुरा, कांवर, बहेड़ी, पीलीभीत, बरखेड़ा, जलालाबाद पर विजय हुई थी।
सीटों पर विपक्षियों को आंख दिखाई थी।

2007

जनता ने बसपा को स्पष्ट बहुमत से सरकार में बिठाया तो रुहेलखंड ने भी बसपा को पलकों पर सजाया। इस बार रुहेलखंड की सिरमौर भाजपा या सपा नहीं, बल्कि बसपा हो चुकी थी। बसपा ने तब मंडल की 12 सीटों बिल्सी, उसहैत, दातागंज, आंवला, फरीदपुर, बरेली कैंट, भोजीपुरा, बीसलपुर, पूरनपुर, निगोही, जलालाबाद, ददरौल पर जीत हासिल की थी।

2012

बसपा की राह पर चलकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था। बसपा की तरह सपा ने पिछले चुनाव में बरेली मंडल में शानदार प्रदर्शन किया था। समाजवादी पार्टी ने तब बिसौली, सहसवान, बदायूं सदर, शेखूपुर, बहेड़ी, नवाबगंज, फरीदपुर, पीलीभीत, बरखेड़ा, पूरनपुर, कटरा, पुवायां, ददरौल सीटें हासिल की थी।

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