कांग्रेस के लिए मुश्किल खड़ी कर गए अखिलेश

ऊंचाहार (रायबरेली) से
प्रदीप श्रीवास्तव
मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह ने सोमवार को ऊंचाहार (रायबरेली) अपने पार्टी के उम्मीदवार मनोज पांडेय को जिताने के लिए रैली की। वे अपनी इस रैली से रायबरेली के संसदीय क्षेत्र में आने वाली इस सीट और बाकी सीटों पर कांग्रेस के लिए परेशानी भी छोड़ गए हैं। दरअसल रायबरेली की 6 सीटों में दो सीटों पर गठबंधन के दोनों घटक दल सपा और कांग्रेस ने उम्मीदवार अपनी पार्टी टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं और दोनों ही सीटों पर यह चारों उम्मीदवार मजबूत हैं।
संसदीय क्षेत्र के नाते रायबरेली और इससे सटी अमेठी की लोकसभा सीट कांग्रेसियों का भले ही पुराना गढ़ रहा हो, पर विधानसभा चुनाव नजरिए से देखें तो पिछले 2012 के चुनाव में इन दोनों क्षेत्रों की 10 में से 7 सीटों पर सपा का कब्जा रहा। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के वोट प्रतिशत में शानदार वृद्धि दर्ज की गई थी। यदि वैसा लाभ मिला तो भाजपा सत्ताधारी सपा और कांग्रेस के गठबंधन के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है।
रायबरेली में ब्राह्मण की मतदाताओं की अच्छी संस्था होने के बावजूद कांग्रेस सहित किसी पार्टी ने एक सीट ऊंचाहार को छोड़कर कहीं से भी ब्राह्मण नहीं खड़ा किया है। ऊंचाहार से मनोज पाण्डेय को सपा ने उम्मीदवार बनाया है। वे 2012 के चुनाव में यहां से जीत चुके हैं। कांग्रेस ने यहां से अजयपाल सिंह को खड़ा किया है, जबकि भाजपा ने स्वामी प्रसाद मौर्य के बेटे उत्कर्ष मौर्य को टिकट दिया है। 2012 के चुनाव में उत्कर्ष बसपा के टिकट पर लड़ रहे थे। बसपा ने भी राजपूत उम्मीदवार गजाधर सिंह को दिया है।
पिता को पार्टी से निकाला था, अब बेटी को टिकट दिया
रायबरेली में ऊंचाहर की सीट के अलावा बाकी रायबरेली सदर, बछरावां, सरेनी, हरचंदपुर, सलोन कुल पांच सीटें हैं। राय बरेली कचहरी के एक चैंबर में जो भी वकील बैठे थे उसमें एक छोड़ सभी राजपूत थे। इनमें से एक सुनील सिंह के मुताबिक ब्राह्मण मतदाता भ्रम में हैं कि किधर जाएं। हो सकता है उनका अंत में ज्यादातर वोट भाजपा को चला जाए। पिछले चुनाव को देखें तो भाजपा का हर जगह वोट प्रतिशत काफी कम रहा है और दूसरी तरफ सपा और कांग्रेस के वोट प्रतिशत को जोड़ दें, तो गठबंधन का हर प्रत्याशी आसानी से जीत रहा है। लेकिन इतनी आसानी से जीत तभी संभव है जब कांग्रेस और सपा के वोटर एकतरफा मतदान करें, लेकिन ऐसा हो पाएगा, इस पर संशय है। एकतरफा मतदान हुआ तो भाजपा यहां सफल नहीं हो पाएगी। चुनाव जीता था कांग्रेस से निकाले गए अखिलेश कुमार सिंह ने। जिन्होंने अपनी पार्टी पीएसपी बनाकर 39.73 फीसदी वोट पाए थे। इस बार अखिलेश सिंह की बेटी अदिति सिंह को कांग्रेस ने टिकट दिया है। यहां सपा का कोई उम्मीदवार नहीं है।
सपा-कांग्रेस ही आमने-सामने
ऊंचाहार से भी भाजपा को 2.02 फीसदी वोट मिले थे, जबकि सपा को 33.18 और कांग्रेस को 25.66 प्रतिशत वोट मिले थे। यहां सपा और कांग्रेस दोनों मैदान में है। जबकि बसपा के उम्मीदवार ने पिछले साल 31.8 प्रतिशत वोट पाकर दूसरा स्थान प्राप्त किया था। बछरांवा में सपा ने 32.92 और कांग्रेस ने 16.2 प्रतिशत वोट पाए थे। यहां भाजपा का 2.9 फीसदी वोट था। पीएसपी 11 को फीसदी वोट मिले थे।
हरचनपुर सीट पर भी सपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों का समिति वोट 54 फीसदी, बसपा का 16 और भाजपा का 4.5 फीसदी वोट था। सरेनी में सपा को 35.6 और कांग्रेस काे 25.52 फीसदी वोट मिला था। यहां बसपा का 27 और भाजपा का 4 फीसदी वोट था।
गांधी-नेहरू परिवार की जागीर!
रायबरेली और अमेठी दोनों की सीटों के साथ कांग्रेस के सम्मान का भी मामला जुड़ा है। नेहरू, गांधी परिवार का संबंध रायबरेली से पहले चुनाव से जुड़ा है। फिरोजगांधी यहां से 1952 से 1960 तक लोकसभा सांसद रहे। इसके बाद 1967 तक यह सीट स्थानीय नेताओं के पास रही। 1967 में इंदिरा गांधी ने इसे अपना क्षेत्र बनाया। 1977 में वे पहली दफा यहां से हारी। इमरजेंसी के बाद हुआ यह चुनाव ऐतिहासिक माना जाता है। 1980 में इंदिरा गांधी दो जगह से चुनाव लड़ी थी। दोनों जगह जीती। पर उन्होंने दक्षिण भारत में स्थित मेढक को चुना और रायबरेली सीट से इस्तीफा दिया। उपचुनाव में अरुण नेहरु चुने गए। इसके बाद 1999 में सोनिया गांधी ने भी अपने लिए राय बरेली को चुनाव और तब से वे इस सीट पर जीतती आई हैं।

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