अरुणाचल में फिर तुकी सरकार की बहाली, केंद्र को झटका

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नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को भारतीय जनता पार्टी एवं केंद्र को करारा झटका देते हुए अरुणाचल प्रदेश विधानसभा सत्र को एक महीने पहले बुलाने के राज्यपाल के निर्णय को असांविधानिक बताते हुए खारिज कर दिया और प्रदेश में कांग्रेस सरकार की बहाली का आदेश दे दिया। साथ ही 15 दिसंबर से पहले की स्थिति कायम रखने को कहा। कोर्ट के फैसले के 11 घंटे के अंदर कांग्रेस नेता नबाम तुकी ने दिल्ली के अरुणाचल भवन में ही में सीएम पद का चार्ज संभाल लिया। उन्होंने खुद घोषणा की कि’ दिल्ली स्थित अरुणाचल भवन में मैंने अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री का पदभार संभाल लिया है।’ नबाम तुकी ने राज्य में कांग्रेस सरकार बहाल करने के उच्चतम न्यायालय के बुधवार के फैसले का स्वागत करते हुए इसे लोकतंत्र की बड़ी जीत करार दिया है। उन्होंने न्यायालय के फैसले पर कहा- ‘शीर्ष न्यायालय ने संविधान की रक्षा करते हुए मेरी सरकार को बहाल करने का मौका दिया है। राज्यपाल ने प्रधानमंत्री के इशारे पर मेरी सरकार को ही हटा दिया था। उच्च न्यायालय के बुधवार के फैसले से तय हो गया है कि मुख्यमंत्री कालिखो पुल अवैध और असंवैधानिक सरकार चला रहे हैं। उच्चतम न्यायालय से हमें न्याय मिला है। इस फैसले से देश और संविधान की रक्षा हुई है। यह ऐतिहासिक तथा महत्वपूर्ण फैसला है और देश की जनता को इसी फैसले का इंतजार था। कानून ने ही हमारी और देश की रक्षा की है। ‘ वहीं, केंद्र के एटॉर्नी जनरल ने भी कहा कि सरकार रिव्यू पिटीशन दाखिल नहीं करेगी। बता दें कि उत्तराखंड में मई में फ्लोर टेस्ट कराने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मोदी सरकार को दो महीने में यह दूसरा झटका लगा है उत्तराखंड के बाद अरुणाचल प्रदेश ऐसा दूसरा राज्य है जहां उच्चतम न्यायालय ने पिछले कुछ महीनों में ‘राजनीतिक दावपेंचों’ के तहत बर्खास्त सरकार को बहाल किया है। केंद्र सरकार ने कहा कि इस बारे में उच्चतम न्यायालय के फैसले पर वह आदेश और सभी संबंधित पहलुओं के अध्ययन के बाद ही कोई टिप्पणी करेगी।
न्यायमूर्ति जे एस खेहर की अध्यक्षता वाले पांच न्यायाधीशों के सांविधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से अपने ऐतिहासिक फैसले में अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा के 14 जनवरी 2016 से एक महीने पहले ही 16 से 18 दिसंबर 2015 को बुलाये जाने के निर्देश को खारिज कर आदेश दिया कि विधानसभा में 15 दिसंबर, 2015 की यथास्थिति कायम रखी जाये। पीठ के आदेश ने नाबाम तुकी की बर्खास्त कांग्रेस सरकार की सत्ता में वापसी का रास्ता साफ कर दिया। पीठ ने कहा कि राज्यपाल के नौ दिसंबर, 2015 के आदेश की अनुपालन में राज्य विधानसभा द्वारा उठाये गये सभी कदम एवं फैसले बरकरार रखने योग्य नहीं है। गौरतलब है कि अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस के 47 में से 21 विधायकोंं द्वारा तुकी के खिलाफ बगावत करने के बाद मची उथलपुथल के कुछ दिन बाद नाबाम तुकी के नेतृत्व वाली सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था और राज्य में 26 जनवरी को राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था।
सांविधानिक पीठ ने गत 20 फरवरी को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रखा था और इससे कुछ पहले ही कांग्रेस के बागी नेता कालिखो पुल ने 60 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के 18 असंतुष्ट विधायकों, दो निर्दलियों के समर्थन और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 11 विधायकों के बाहरी समर्थन के साथ मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। पीठ में न्यायमूर्ति खेहर के अलावा न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एम बी लोकुर, न्यायमूर्ति पी सी घोष और न्यायमूर्ति एन वी रमन शामिल हैं। न्यायालय का यह फैसला कांग्रेस के लिए खासतौर से उत्साहजनक है क्योंकि उत्तराखंड के बाद अरुणाचल प्रदेश ऐसा दूसरा राज्य है जहां न्यायालय ने पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को बहाल किया है।
न्यायमूर्ति खेहर ने विस्तृत मुख्य फैसला सुनाते हुए क्रियात्मक हिस्सा पढ़ा और कहा कि विधानसभा का सत्र 14 जनवरी, 2016 से एक महीने पहले 16 दिसंबर, 2015 को बुलाने संबंधी राज्यपाल का नौ दिसंबर, 2015 का निर्देश संविधान के अनुच्छेद 163 (अनुच्छेद 174 के साथ पढ़ा जाये) का उल्लंघन है और यह खारिज किये जाने लायक है तथा इसे खारिज किया जाता है। फैसले में कहा गया है कि 16 से 18 दिसंबर, 2015 को होने वाले विधानसभा के छठे सत्र की कार्यवाही के तरीके के बारे में निर्देश देना वाला राज्यपाल का संदेश संविधान के अनुच्छेद 163 (अनुच्छेद 175 के साथ पढ़ा जाये) का उल्लंघन है और इस तरह यह खारिज करने लायक है लिहाजा इसे खारिज किया जाता है। पीठ ने कहा कि अंत में पहले निर्णय से लेकर तीसरे निर्णय के मद्देनजर 15 दिसंबर 2015 की यथास्थिति बहाल करने का आदेश दिया जाता है।
न्यायमूर्ति मिश्रा एवं न्यायमूर्ति लोकुर ने एक अलग एवं समवर्ती निर्णय पढ़ते हुए कहा कि वे न्यायमूर्ति खेहर के विचार से असहमत नहीं हैं और उन्होंने राज्यपाल एवं विधानसभा अध्यक्ष के कार्यालय संबंधी कुछ और टिप्पणियां जोड़ीं। न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि राज्यपाल का व्यवहार न सिर्फ निष्पक्ष होना चाहिए वरन यह स्पष्ट रूप से दिखना भी चाहिए। पीठ ने पूर्व में याचिकाओं के दो अन्य सेट अलग कर दिये थे जो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाये जाने और फिर इसे हटाये जाने, जिसके बाद नयी सरकार का गठन हुआ था, को लेकर दायर की गयी थीं। गत फरवरी में जिस दिन पीठ ने फैसला सुरक्षित रखा था उस दिन उसने पुल के नेतृत्व वाली सरकार के ‘अवैध’ शपथग्रहण के खिलाफ कांग्रेस की याचिका पर अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया था और कहा था कि यदि राज्यपाल की कार्रवाई असांविधानिक पायी जाती है तो वह ‘घड़ी को उल्टा घुमा सकता है।’ कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने यहां संवाददताओं से बातचीत में इस फैसले के बारे में पूछे गये सवालों के जवाब में कहा कि सरकार को अभी फैसले की प्रति नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि सरकार न्यायालय के आदेश का अध्ययन कर और इससे जुड़े सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए बाद में इस पर सुविचारित टिप्पणी करेगी।

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