गौरवशाली अतीत है ‘वंदे मातरम’ का!

कोलकाता : ‘मेरी सारी किश्तियां गंगा में डुबा दो तो कोई हानि नहीं होगी, परन्तु यह एक शाश्वत महान गीत बचा रहेगा तो देश के हृदय में मैं जीता रहूंगा।’ ये शब्द किसी फिल्म का डायलॉग नहीं बल्कि राष्ट्रीय पुनरुत्थान के अग्रदूत बंकिमचंद चटर्जी के हैं। ये बातें उन्होंने आज से सौ से भी अधिक वर्ष पूर्व लिखे गए अपने गीत वंदे मातरम् के बारे में व्यक्त करते हुए लिखा था-‘वंदे मातरम्’ का यह गीत जन-जन के हृदयों पर एक घोषणा के रूप में अंकित हो जाएगा और देशभक्तों के अंत:करण की आवाज का शब्दबद्ध प्रतिरूप सिद्ध होगा।
18वीं शताब्दी के अंत में बंगाल के मुस्लिम शासकों के क्रूरतापूर्ण व्यवहार के विरोध में प्रख्यात उपन्यासकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने ‘आनन्दमठ’ शीर्षक के अन्तर्गत एक उपन्यास लिखा जिसमें पहली बार ‘वन्दे मातरम्’ गीत छपा जो पूरे एक पृष्ठ पर आधारित था। इस उद्घोष का सबसे अधिक प्रयोग सन् 19०5 ई. में हुआ जब तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन ने ‘बाँटो और राज करो’ की नीति का अनुसरण करते हुए बंगाल को दो टुकड़ों में विभाजित करने की घोषणा की और इस विभाजन को बंग-भंग की संज्ञा दी गई।
लार्ड कर्जन की इस नीति का भयंकर रूप से विरोध हुआ और उस समय विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग के आन्दोलन के साथ-साथ ‘वन्दे मातरम’ उद्घोष को भी व्यापक रूप से जनसाधारण ने अपनाया। इसके बाद लगातार अंग्रेजों के विरुद्ध जो भी आन्दोलन इस देश में प्रारम्भ हुए, उन सभी में ‘वन्दे मातरम्’ जन-जन का उद्घोष बन गया। बंगाल से प्रारम्भ होकर यह उद्घोष पूरे राष्ट्र में व्यापक रूप से फैल गया।
14 अप्रैल 1906 को बंगाल का प्रांतीय अधिवेशन बारीसाल में तय किया गया था। सरकार ने गांव-गांव में दीवारों पर पत्रक टांग कर घोषणा की कि जो ‘वंदे मातरम्’ गायेगा, उसे दंड दिया जायेगा। युवकों ने घोषणा की कि अधिवेशन की शुरुआत जुलूस से होगी जिसमें ‘वंदे मातरम्’ गाया जाएगा।
अमृत बाजार के तत्कालीन संपादक मोती लाल घोष ने गर्जना की कि चाहो तो मेरा सिर फोड़ दो पर वंदे मातरम् हम गायेंगे ही। ‘जुलूस में वंदे मातरम् का गान हुआ और पुलिस ने लाठी चार्ज किया। जख्मी युवकों को उसी हालत में अधिवेशन में लाया गया और हजारों प्रतिनिधियों ने खड़े होकर वंदे मातरम् की गूंज से पुलिस राज का हृदय कंपा दिया।
6 अगस्त 19०6 को विपिनचंद्र पाल ने अंग्रेजी दैनिक में ‘वंदे मातरम’ का प्रकाशन शुरू किया। बाद में इसका संपादन श्री अरविन्द ने संभाला। कलकत्ता कांग्रेस में भगिनी निवेदिता ने ‘वंदेमातरम्’ से अंकित राष्ट्रध्वज तैयार किया। नवम्बर 1907 में ‘युगांतर’ में लिखा ‘वंदे मातरम्’ की घोषणा से शत्रु का धैर्य टूट गया है। उसका सामर्थ्य टूट गया।
स्वातंत्रय वीर वि. दा. सावरकर को जिन लेखों के कारण ‘काला पानी’ का दण्ड मिला, उनमें सबसे महत्वपूर्ण लेख ‘वंदेमातरम्’ है जो 1907 में मुम्बई से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘बिहारी’ में प्रकाशित हुआ।
15 अगस्त 1947 को जब हमारा देश आजाद हुआ तब 14-15 अगस्त की मध्य रात्रि में सत्ता के हस्तान्तरण के लिए तत्कालीन केन्द्रीय एसेम्बली का एक विशेष अधिवेशन आयोजित किया गया जिसका प्रारम्भ ‘वंदे मातरम्’ के गायन से हुआ और यह राष्ट्रीय गीत बहुत ही मधुर स्वर से श्रीमती सुचेता कृपलानी द्वारा प्रस्तुत किया गया। इस विशेष अधिवेशन का अंत भी इसी गीत के साथ हुआ।
एसेम्बली में सभी उपस्थित सदस्यों ने इस गायन में श्रद्धापूर्वक भाग लिया और इस उद्घोष के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया और सारा हाल ‘वंदे मातरम्’ के उद्घोष से लगातार गूंजता रहा। (युवराज)संजय कुमार ‘सुमन’

शेयर करें

मुख्य समाचार

राम अवतार गुप्त प्रोत्साहन, ऐसे करें आवेदन

" हमारा सपना हर छात्र माने हिंदी को अपना" हर साल की तरह इस साल भी हम लेकर आये हैं राम अवतार गुप्त प्रोत्साहन। इस बार आगे पढ़ें »

सियालदह तक मेट्रो की सौगात नए साल में

सियालदह तक मेट्रो शुरू करने की कवायद में जुटा प्रबंधन सन्मार्ग संवाददाता कोलकाताः ईस्ट वेस्ट मेट्रो कॉरिडोर के तहत कोलकाता मेट्रो रेलवे कॉरपोरेशन (केएमआरसीएल) ने सियालदह मेट्रो आगे पढ़ें »

ऊपर