‘मृत्यु भी एक उत्सव’ सोच वाली इंदु जैन नहीं रहीं

टाइम्स ग्रुप की चेयरपर्सन इंदु जैन का 84 साल की उम्र में निधन
नई दिल्लीः टाइम्स ऑफ इंडिया मीडिया समूह की चेयरपर्सन इंदु जैन का गुरुवार को निधन हो गया। वे 84 साल की थीं। उन्हें 2016 में देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। जैन कल्याणकारी गतिविधियों के लिए स्थापित टाइम्स फाउंडेशन की संस्थापक भी थीं और उन्होंने उद्योग लॉबी फिक्की की महिला विंग की भी स्थापना की।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंदु जैन के निधन पर शोक जताया और कहा कि सामुदायिक सेवा के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए पहल, भारत की प्रगति को लेकर उनके जज्बे और संस्कृति के प्रति गहरी दिलचस्पी के लिए उन्हें याद किया जाएगा। उन्होंने ट्वीट कर कहा, ‘टाइम्स समूह की अध्यक्ष इंदु जैन के निधन से दुखी हूं। सामुदायिक सेवा के क्षेत्र में उनके द्वारा उठाए गए कदमों, भारत की प्रगति को लेकर उनके जज्बे और संस्कृति के प्रति गहरी दिलचस्पी के लिए उन्हें याद किया जाएगा।’
उन्होंने वर्षों पहले ‘आर्ट ऑफ डाइंग’ को लेकर एक पत्र लिखा था और कहा था कि उनकी मृत्यु पर शोक नहीं, उत्सव मनाया जाए। यह मृत्यु को लेकर उनकी अलग सोच बताती है। उनके निधन के बाद सामने आया यह पत्र बताता है कि जीवन और मृत्यु को लेकर उनकी क्या सोच थी।

आप भी पढ़िए उसके चुनिंदा अंश –
प्रिय आत्मवर,
मृत्यु की कला जीने की कला का ही विस्तार होना चाहिए। मैं सौभाग्यशाली रही कि मुझे पुरसुकून और सुविधाओं से संपन्न जिंदगी जीने का मौका मिला। लेकिन मेरी जिंदगी में जो अनकही खुशियां मिलती रहीं, वही मेरा सबसे बड़ा पुरस्कार रहा है। मुझे कभी किसी चीज के लिए तरसना नहीं पड़ा। केवल दुःख का ही अभाव रहा है। अगर वह कमी या भाग्य या कुछ और है, तो भी क्या फर्क पड़ता है।
बेशक सभी नश्वर प्राणियों की तरह असंतुष्ट महसूस करने के कई अवसर और कारण रहे हैं, लेकिन ऐसे हर अवसर पर मैंने अपने आप से पूछा कि ‘क्या खुद को दु:खी होने की सजा देने की कोई जरूरत है?’ इसके जवाब ने हमेशा ऐसे नकारात्मक विचारों को तेजी से दूर किया है। इसी वजह से मेरा यकीन है कि सुख के साथ जीवन से विदाई भी खुशी के चारों ओर ध्वनि और उत्साह के बीच होगी।
इन सभी वर्षों में मैं हमेशा नए अनुभवों के लिए बेचैन रही हूं। सच कहूं तो ये जिंदगी नीरस हो गई है। एक व्यक्ति को वहां जाने का अधिकार मिला, वह वहां गया और उसने जाकर टी-शर्ट खरीदी। अब एक साहसिक यात्री के तौर पर मैं उस अंतिम सीमा का अनुभव करना चाहती हूं। मुझे अब भी इस पर यकीन है कि मैं जहां पहले कभी नहीं गई, वह अनजान जगह मुझे निराश नहीं करेगी। हर किसी ने इसके रहस्य की बात की है कि उस पार न जाने क्या होगा, उस पार जरूर कुछ नया होगा। मैं इसका पता लगाने के लिए बेसब्र हो रही हूं।
यह सब कहने के बाद, मैं आराम से जाना चाहूंगी। मृत्यु को बताएं, बहुत अच्छे और सौम्य अंदाज में, मैं सांसारिक मामले निपटाने को लेकर चिंतित नहीं हूं। भौतिक बंधन पहले से ही खुल चुके हैं, क्योंकि मैं अंतिम मंजिल से पहले अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रही हूं। यह सांसारिक चिंताओं और शोर से दूर एक शांत आश्रम होगा।
मेरे दोस्त मेरे जाने की तैयारी कर रहे हैं। जो मेरे करीब हैं और वास्तव में मुझे जानते हैं, उन्हें पता है कि सांत्वना से भरे शोर की जरूरत नहीं है। वे जानते हैं कि मैं मौत को उसी बेहिसाब उत्सव के साथ गले लगाऊंगी, जिस उत्सव के साथ मैंने जीवन को गले लगाया है। इस जागरूक क्लब में मेरे गुरु भी हैं, जिन्होंने मेरा पालन-पोषण और मुझसे लाड़-प्यार किया है। कभी-कभी मुझे यह सोचकर हंसी आती है कि मेरे लिए शोक कौन मनाएगा।
अगर कोई अंतिम इच्छा है, तो यह है- किसी को भी मेरे जाने की सूचना न दी जाए। किसी को पूछने की जरूरत नहीं है ‘इंदु कहां है?’ क्योंकि जहां भी हंसी होगी, वे उसे वहीं पाएंगे। शरीर के निर्जीव खोल का अंतिम संस्कार उसी तरह करें, जो आश्रमवासी सबसे अच्छा महसूस करें। फिर, मैं उड़ जाऊंगी, आग, मिट्टी, पानी, हवा और अंतरिक्ष से लंबे समय से प्रतीक्षित मिलन के लिए…
हमेशा से तुम सभी में…
प्रेम सहित

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