किसान मांगों पर अड़े तो वार्ता आगे कैसे बढ़े ?

नई दिल्ली : केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों पर सरकार और किसानों के बीच दंगल जारी है। पंजाब-हरियाणा के हजारों किसान दिल्ली बॉडर पर पिछले 3 हफ्ते से डेरा डाले हैं। आज यानी मंगलवार को किसान आंदोलन का 20वां दिन है। किसानों की जिद है कि केंद्र अपने तीनों नए कृषि कानूनों को वापस ले। लेकिन मोदी सरकार कानून वापस नहीं ले रही है, हालांकि किसानों की मांग पर कुछ संशोधन करने को तैयार है। लेकिन किसान संशोधन पर नहीं मान रहे हैं, ऐसे में दोनों के बीच गतिरोध बरकरार है।

नितिन गडकरी की सलाह – कट्टर तत्वों से रहें दूर, बातचीत से निकालें हल

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने किसानों से अपील की है कि वे कट्टर तत्वों से खुद को बचाए रखें। गडकरी ने कहा कि नए नियमों के तहत किसानों को कोई नुकसान नहीं है। यह पूछे जाने पर कि आखिर एमएसपी पर सरकार कानून क्यों नहीं ला सकती है, गडकरी ने कहा कि कैबिनेट हर साल उसके दाम तय करती है। राज्य सरकार के सहयोग से केंद्र सरकार किसानों के उत्पादों को खरीदने के लिए बाध्य है। ऐसे में कानून की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि हमने 6 साल में 6 बार दाम बढ़ाए। राजनीति होती है पर किसानों के हित का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए।

खाद्य मंत्रालय की स्थाई समिति की बैठक

किसान एमएसपी को भविष्य में बनाए रखने के लिए सरकार से लिखित गारंटी देने की मांग कर रहे हैं जिसपर सरकार राजी भी हो गई है। वहीं, एमएसपी पर कानून बनाने की भी मांग उठ रही है। इस बीच, आज खाद्य और उपभोक्ता मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थाई समिति की बैठक बुलाई गई है। बैठक में खाद्य मंत्रालय के अधिकारियों को बुलाया है। बैठक में फसलों की खरीद, उसके रखरखाव और वितरण के बारे में अधिकारियों से वार्ता होनी की संभावना है। बता दें कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 13 दिसम्बर तक सरकार ने करीब 13 राज्यों की अलग अलग सरकारी मंडियों से 3.75 करोड़ मीट्रिक टन धान की खरीद कर ली है।

क्या है किसानों की मांग

किसान संगठनों ने तर्क दिया है कि किसानों की ओर से कभी भी ऐसे कानूनों की मांग ही नहीं की गई तो सरकार इन्हें वापस ले ले। नए कृषि कानूनों से एमएसपी, मंडी सिस्टम खत्म होगा, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से किसान सीधे कंपनी के टच में होगा, लेकिन कुछ गड़बड़ी होने पर कोई जवाबदेही नहीं होगी। ऐसी ही कई गलतियां गिनाकर किसानों ने केंद्र के तीनों कृषि कानूनों को खारिज किया और अपने आंदोलन को जारी रखा। अबतक किसान अपने आंदोलन के तहत देशव्यापी बंद बुला चुके हैं, उपवास रख चुके हैं, टोल-नाकों को मुक्त कराने का प्लान है, भाजपा के नेताओं की घेराबंदी का ऐलान किया हुआ है और कृषि कानूनों की वापसी तक इनपर अड़े हैं।

सरकार भी संशोधनों पर अड़ी

तीनों कृषि कानूनों को मोदी सरकार ने ऐतिहासिक करार दिया है और किसानों के जीवन में बदलाव लाने की बात कही है। लेकिन किसान इन कानूनों को काला कानून का नाम देकर इसे वापस लेने की मांग कर रहे हैं। लगातार हो रहे विरोध के बाद केंद्र ने किसानों से बात करने और कानून में कुछ बदलाव करने का प्रस्ताव रखा। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की अगुवाई में सरकार और किसान संगठनों के बीच 6 दौर की बात हो चुकी है। गृह मंत्री अमित शाह भी किसानों से मिले हैं और इस मुद्दे को स्वयं देख रहे हैं। सरकार ने किसानों के कुछ मांगों और मुश्किलों को समझते हुए लिखित संशोधन प्रस्ताव भी भेजा है।

किसानों की मांगों और विरोध को देखते हुए केंद्र ने तीनों कानूनों में कुछ बदलाव की बात कही है – जिसमें एमएसपी की लिखित गारंटी, मंडी सिस्टम को मजबूती देना, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में स्थानीय कोर्ट जाने का रास्ता, आंदोलन से जुड़े किसानों पर हुए केस वापस लेना, बिजली बिल-प्रदूषण कानून में ढील जैसे संशोधन शामिल हैं। सरकार ने इनके अलावा अन्य मुद्दों पर बातचीत का रास्ता खुला रखने की बात कही है। लेकिन किसानों ने हर मोर्चे पर पीछे हटने से इनकार कर दिया। हालांकि, सरकार ने अपने इरादे स्पष्ट किए हैं कि कानून किसी भी हाल में वापस नहीं लिया जाएगा।

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