Sunday Special: नई आशाओं, उमंगों और तरक्की में सब पर इक्कीस रहे 2021

घूमती हुई घड़ी की सुइयों एवं पल पल चलते हुए समय के साथ सन 2021 के द्वार पर दस्तक देने आ गया है यानी उसने पहले ही ठान लिया था कि वह 20 से 21 होकर दिखाएगा। यूं तो घूमती हुई धरती के साथ एक साल का जाना और दूसरे साल का आना प्रकृति का शाश्वत नियम है। न किसी के बुलाए कोई आया है और न समय से पहले कोई गया है। यही सन 2021 पर भी लागू होता है लेकिन कहते हैं कि विगत अपनी स्मृतियां प्रभाव एवं निशान छोड़कर जाता है। जो 2019 वे 2020 के साथ किया वही 2020 ने 2021 के साथ किया है यानी पहली जनवरी से 2020 केवल यादों में रह जाएगा और 2021 अपने वर्तमान से भविष्य को अपने तरीके से गढ़ने एवं सवारने का प्रयत्न करेगा।
वैसे तो 2020 ने भी ऐसा ही किया था। अब यह अलग बात है कि 2020 की स्मृतियों में कड़वे अनुभव ज्यादा एवं मधु स्पर्श कम रहे। अभी यह भी नहीं कह सकते कि 2021 कैसा रहेगा पर आशाएं रखनी चाहिएं, सपने देखने चाहिए। लक्ष्य तय करने चाहिएं और साधने भी चाहिए। तभी तो जीवन का ग्राफ ऊपर की तरफ बढ़ेगा। 2021 का स्वागत इन्हीं आशाओं, अभिलाषा एवं सपनों के साथ करते हैं। एक नजर डालते हैं 2020 के घटनाक्र मों पर और देखने की कोशिश करते हैं 2021 को सपनों के गवाक्ष से।
एक जनवरी 2020 भी उसी तरह सामान्य रूप से शुरू हुआ जैसे 2019 आया था । 2019 में देश ने लोकसभा चुनाव में वापस लौटे हुए प्रधानमंत्री एवं भाजपा की सरकार का अप्रत्याशित रूप से भारी बहुमत के साथ लौटना देखा तो बिहार के चुनावों में जब सारे चैनल, अखबार और मीडिया के दूसरे स्रोत लगातार कह रहे थे कि इस बार सुशासन बाबू यानी नीतीश कुमार किसी कीमत पर नहीं लौटने वाले हैं और तेजस्वी के तेज के साथ महागठबंधन इस बार बिहार में लालू एंड कंपनी की वापसी कराएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नरेंद्र मोदी, अमित शाह, सुशील मोदी और दूसरे बीजेपी के सूरमाओं की खांटी राजनीति के आगे महागठबंधन विफल रहा और नीतीश बाबू फिर से मुख्यमंत्री हो गए ।
जब 2020 आया तो दुनिया भर से सितंबर 2019 के महीने से नई महामारी कोविड-19 के प्रकोप की खबरें आ रही थी। अमेरिका, इटली, स्पेन, ब्रिटेन, जर्मनी सब उस से जूझ रहे थे, तब तक भारत में कोविड-19 का एक भी संक्र मित व्यक्ति आन रिकार्ड नहीं था मगर 30 जनवरी को भारत में भी लाल वायरस यानी कोविड-19 के वायरस ने दस्तक दे दी । सरकार ने तुरंत संज्ञान भी लिया लेकिन अन्य देशों की ही तरह संक्र मण के प्रसार को पूरी तरह नहीं रोक पाई और मार्च आते-आते कोविड-19 ने हाहाकार मचा दिया। लोग अपने कार्य स्थलों को छोड़कर मूल स्थानों की ओर भागने लगे। देशभर में लाकडाउन से कर्फ्यू जैसे हालात पैदा हो गए और देखते ही देखते कोविड-19 संक्र मितों की संख्या लगभग एक करोड़ तक पहुंच गई। भारत जैसे देश में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं एवं संसाधन बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते, इस महामारी से जूझने में खून पसीना एक करते रहे और सबसे अच्छी बात यह है कि संक्रमण की संख्या बढ़ने के बावजूद भी तबाही नहीं बची क्योंकि भारतीयों का जीवट दमखम के साथ कोविड-19 को आईना दिखा रहा था । आज तो इससे संक्रमित होने वाले लोगों में से लगभग 93 प्रतिशत ठीक हो रहे हैं यानी 2020 ने यदि आपदा दी तो इस आपदा से लडऩे के अवसर भी प्रदान किए । हालांकि भारतीयों की लापरवाही भरी प्रवृत्ति के चलते दीपावली के बाद एक बार फिर से कोविड-19 पैर पसारता दिखा लेकिन इस बार भी हम हार मानने को तैयार नहीं हैं।
कोविड-19 के प्रकोप में तबलीगी जमात के बाद किसान आंदोलन एवं सी ए ए के विरोध में चलने वाले धरना एवं प्रदर्शन से जूझना सरकारी उपक्र म के लिए एक बड़ी चुनौती बनी । जहां अपने अपने चश्मे से मीडिया एवं लोगों ने इसमें अपनी सहूलियत के अनुसार राजनीति देखी, वहीं आम भारतीयों ने जिस प्रकार से लाकडाउन के दौरान एक दूसरे की मदद की, लोगों के लिए खाना एवं रहने के स्थान उपलब्ध कराए एवं उन्हें ढांढस बंधाया, उससे एक बार फिर से ‘जयतु भारतम’ का उद्घोष कानों से लेकर मन की गहराइयों तक गूंजा। सलाम है उन संस्थाओं एवं व्यक्तियों को जिन्होंने प्रलयंकारी कहे जा रहे 2020 में सृजनात्मक भाव का बीजारोपण किया। उम्मीद है 2021 में भी यह जारी रहेगा वैसे तो प्रबल संभावनाएं है कि 2021 के पहले तीमाही में ही स्वदेशी एवं विदेशी वैक्सीन आ जाएंगे एवं दूसरी बीमारियों की तरह कोरोना पर भी काबू पा लिया जाएगा । बेशक 2021 ने यह सपना दिखाया है और हमें इस सपने को यथार्थ में बदलना है। तभी सन 2021 बीते बरसों से 21 साबित हो सकता है।
2020 में ही राम मंदिर की नींव पड़ी और विघ्न संतोषियों के पूरे प्रयासों के बावजूद न कोई चिल्ल पौं मची, न धरने प्रदर्शन हुए। जहां राम का मंदिर जल्दी ही बनना शुरू हो जाएगा, वहीं भारत की नई संसद की नींव भी 2020 में रख दी गई है यानी अब हम अपेक्षाकृत बड़े ज्यादा सुविधा संपन्न एवं आधुनिक संसद भवन में से सरकार चला पाएंगे, कहने की जरूरत नहीं है कि संसद भवन में बैठने वाले सांसदों की संख्या क्षमता भी पहले से ज्यादा होगी। हमें ब्रिटिश लुटियंस द्वारा डिजाइन किए गए संसद भवन में नहीं अपितु पूर्णत स्वदेशी संसद भवन से लोकतंत्र को चलाने का गौरव हासिल होगा मगर यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जिस तरह पुराना संसद भवन 115 साल बाद भी पूरी तरह खंडहर नहीं हुआ है, वैसे ही नया संसद भवन भी मजबूती के हिसाब से इससे भी 21 साबित होगा। तो 2021 से उम्मीद कर सकते हैं कि नए संसद भवन से नई कार्य संस्कृति एवं गरिमामई संसदीय व्यवहार भी देश देखेगा।
कोरोना महामारी के चलते हुए लाॅकडाउन ने हर क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है । उसकी काली नजर से न नई फिल्में बची, न खेल व अर्थव्यवस्था बचे और न ही उड्डयन क्षेत्र यानी लाल कोरोना वायरस ने सारे क्षेत्रों की कमर तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी मगर दिनकर की पंक्तियां हैं ‘है कौन सी बाधा जग में, टिक सके आदमी के मग में’ का अनुसरण करते हुए हम भारतीयों ने इस चुनौती को स्वीकार किया ।
बेशक अर्थव्यवस्था को अभी भी वह गति नहीं मिली है जैसी पहले थी लेकिन रिजर्व बैंक एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार यह संकेत मिल रहा है कि जल्दी ही अर्थव्यवस्था का ग्राफ ऊपर की तरफ जाने लगेगा । जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 लाख करोड़ की राहत राशि घोषित करने का ऐलान किया तो दुनिया भर की आंखें हैरत से फटी रह गई क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था का लगभग 12.5 प्रतिशत होता है और किसी भी दूसरे देश ने इतनी बड़ी राशि का राहत राशि के रूप में ऐलान नहीं किया था। अमेरिका एवं यूरोपीय देशों से यह तुलना करना उचित नहीं होगा क्योंकि वें प्रगति के शिखर पर हैं। तो कह सकते हैं कि सरकार ने कोरोना को मारने के लिए उसके असर को खत्म करने के लिए अपने खजाने खोलने में कंजूसी नहीं की मगर अलग-अलग क्षेत्रों से शिकायतों के भी स्वर सुनने को मिले जैसे इस राशि का सदुपयोग न होना, बंदरबांट की खबरें कोरोना मरीजों की समुचित देखभाल न होने एवं उनकी मृत्यु के बाद उन तक मुआवजे की राशि न पहुंचने की शिकायतें सन 2020 के काले दामन पर और भी बड़े धब्बे छोड़ कर गई।
2021 में हमें सीखना होगा कि आपदा को कमाई का अवसर नहीं बनाना चाहिए अपितु आपदा में आपदाग्रस्त व्यक्तियों समुदाय एवं समूह की सहायता के लिए दिल खोलकर तन मन धन से आगे आना चाहिए । यहां टाटा ग्रुप की पहल को साधुवाद देना तो बनता ही है , देखते ही देखते बहुत सारी संस्थाएं एवं व्यक्ति भी आगे आए। अक्षय कुमार ,सोनू सूद, सचिन तेंदुलकर ,अंबानी समूह और ऐसे कितने ही नाम हैं जिन्होंने कोरोना के अभिशाप पर रोक लगाने के लिए अपने खजाने खोले। इन सभी कोरोना वारियर्स को सलाम और उम्मीद व अपेक्षा कि 2021 में भी यदि कुछ ऐसा होता है तो यें और इनके साथ ही दूसरे व्यक्ति एवं संगठन भी इसी तरह आगे आकर अनुकरणीय उदाहरण पेश करेंगे।
2020 तो गया पर कोविड-19 नहीं गया मगर लोगों के मन से उसका भय करीब-करीब चला गया है । यह अच्छी बात भी है और खतरे का संकेत भी। अच्छी बात यह है कि भय की वजह से मरने की दर बहुत कम हो गई और बुरी बात यह है कि कोरोना की स्टैंडर्ड आॅपरेशन प्रोसेस यानी एस ओ पी का पालन न होने से इस बीमारी के संक्रमण की आशंका बढ़ती जा रही हैं। तो 2021 में जब प्रवेश करें तो मुंह पर मास्क और दो गज की दूरी के दृढ़ निश्चय के साथ आगे बढ़ें। साथ ही साथ बार-बार हाथ धोते रहें, खुद जागरूक रहें एवं औरों को भी जागरूक करें । यदि हम जागरूक रहें तो कोरोना वायरस सो जाएगा और यदि हम सो गए तो कोरोना जाग जाएगा। उम्मीद है 2021 का हमारा व्यक्तिगत एवं सामूहिक लक्ष्य होगा कि किसी भी हाल में कोविड 19 को हम पलटी नहीं मारने देंगे अपितु उसे ऐसी पलटी मारेंगे कि वह फिर कभी लौट कर इस देश की तरफ नहीं देखेगा।
जब कोरोना का जिक्र होता है तो खाली पड़े फिल्म हाल, जनशून्य खेल के मैदान, विवाह शादियों की घट चुकी रौनकें, एक दूसरे के पास आने-जाने एवं मिलने जुलने में बेहद कमी होना तथा ऐसे ही दूसरे पीड़ादाई क्षेत्रों एवं लम्हों का भी जिक्र होगा हालांकि अब हम देख रहे हैं कि वेब सीरीज के माध्यम से एवं 50 प्रतिशत क्षमता के साथ पिक्चर हाल भी आबाद होने लगे हैं । दर्शक अभी मैदान नहीं पहुंचे मगर खिलाड़ी पहुंचने लगे हैं। शादियां अब पूरी तरह बंद नहीं है लेकिन इन सामाजिक रीति-रिवाजों को सुरक्षित करने के लिए सरकार के साथ-साथ व्यक्तिगत प्रबंध भी करने होंगे। तभी तो 2021 हर दृृष्टि से मिलन का वर्ष बन पाएगा।
हमारे यहां ‘बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध लेय’ की आशा भरी कहावत है पर इसके साथ में यह भी जोडऩा होगा कि बीते हुए कड़वे लम्हों से सबक भी लेना है एवं आगे के लिए ऐसा न हो इसका इंतजार भी करना है, न थकना है, न हारना है, न रुकना है क्योंकि हम तो ‘चरैवेति – चरैवेति’ सिद्धांत के समर्थक एवं अनुगामी हैं, फिर भला कैसे रुक सकते हैं ? जब समय नहीं रुकता तो हम क्यों रुकें? और ध्यान रखिए जो रुक गया, थक कर बैठ गया, निराश हो गया, जिसने हार मान ली, वह प्रगति की दौड़ से बाहर हो जाता है । प्रगति के नए सोपान चढऩे हेतु हमें अपने आप को हर तरह से अद्यतन करना होगा तैयार करना होगा और अपनी सुरक्षा के साथ-साथ प्रगति के संसाधनों से सुसज्जित भी करना होगा ।
उम्मीद है सन 2021 हमें वह सब देगा जिसकी हम उम्मीद कर रहे हैं मगर एक बार फिर ‘कर्मण्यैवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन’ के सिद्धांत पर चलते हुए हमें डटकर कर्म पथ पर डटना होगा और 2021 के साथ – साथ समय के शिखर पर चढ़कर गर्व के साथ ‘विश्व गुरु भारतम’ का एलान करने की पूरी कोशिश करनी होगी । (अदिति) डाॅ. घनश्याम बादल

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