हिंदी दिवस पर सन्मार्ग की खास लेख

हिंदी मेरी प्यारी हिंदी । जिसने मुझे दुनिया का सबसे प्यारा शब्द मां बोलना मेरी भाषा में सिखाया । जिसमें मैं हमेशा स्कूल में आगे रही । हिंदी के पराग ,नंदन , चंपक , लोटपोट चंदामामा ने मेरा बाल जगत की रोचक और प्यारी दुनिया से परिचय कराया । हिंदी के सर्वश्रेष्ठ लेखकों से मेरा परिचय कराया । पढ़ने के अपार शौक ने हिंदी का विस्तार पर विस्तार किया । धर्मयुग , साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान माधुरी , सारिका जैसी पत्रिकाओं से मोहब्बत करवायी । अपनी मातृ भाषा की नींव मज़बूत हो तो आप दुनिया की कोई भी भाषा सीख सकते हो अपना सकते हो । मुझे अपने देश की विविध भाषाएं बहुत अच्छी लगती हैं । हिंदी मेरी मां है तो ये मौसियां हैं । मौसी यानी मां जैसी । किसी के लिए विरोध मेरे दिल में नहीं है । मैं पंजाबी , हरियाणवी, हिमाचली भी बहुत अच्छी बोल लेती हूं । मारवाड़ी बहुत अच्छे से समझती हूं । बांग्ला , मराठी , गुजराती , डोगरी , भोजपुरी समझ आ जाती है । गुजराती मराठी राजस्थानी असमिया बांग्ला के भक्ति गीतों के ढ़ेरो कैसेट और सीडी मेरे पास हैं । इनको सुनने में बहुत आनंद आता है । दक्षिण भारतीय भाषाएं बिल्कुल नहीं समझ आती । लेकिन मौका मिला तो ज़रूर सीख लूंगी । आजकल कोलकाता के अखबार में काम करती हूं इसलिए बांग्ला भी सीख रही हूं । हिंदी के नाम पर अंग्रेंजी का विरोध ठीक नहीं है । इंग्लिश में ज़रा भी हाथ तंग नहीं है । इसके लिए मेरे स्कूल के अंग्रेंजी टीचर श्री जयप्रकाश जस्सल और श्री अमरनाथ अहलुवालिया को बहुत बहुत धन्यवाद जिन्होनें हमारी अंग्रेजी ग्रामर की नींव मज़बूत की । जयप्रकाश जी एक वाक्य देते थे जिसे हमें हर रोज़ 72 तरह से लिखना होता था । past , present future , indefinit past , future and present . हिंदी के टीचर अमीर चंद जी पूरी व्याकरण जु़बानी सुनते थे । हाथ में डंडा रहता था जहां हम कहीं लड़खड़ाए वहीं डंडा पड़ता था । कॉलेज गए तो माध्यम इंग्लिश हो गया । दसवीं के बाद कॉलेज था । हिंदी स्कूलों से आने वाले सभी बच्चो की उन दिनों अंग्रेंजी में कंपार्टमेंट आती थी लेकिन अपने 150 में 120 नंबर आए । अनुवाद की तो कभी समस्या ही नहीं हुई । चंड़ीगढ के गर्वनमेंट कॉलेज फॉर वूमेन पूरा अंग्रेंजी दां वातावरण था । यहां शिमला ,मसूरी , नैनीताल , डलहौजी देहरादून के कॉन्वेंट स्कूलों से पढ़ी हुई अति संपन्न घरों की लड़कियाों का बोलबाला था । अपन ठहरे हिंदी मीडियम में पढ़े मध्यम वर्गीय परिवार के ।लेकिन कभी अनके सामने अपने को हीन नहीं समझा । ये लड़कियां फर्राटेदार अंग्रेंजी बोलती थीं । कॉलेज में तिमाही परीक्षाएं होती थीं । मेरी इंग्लिश टीचर मिसेज पी सघेरा विदेश में पढ़ी लिखी पक्की मेम साहिब सरदारनी थीं । लेकिन जब वो मेरी उत्तर पुस्तिका पर लिखतीं— सर्जना यू कैन डू बैटर देन दिस— तो यकीन नहीं आता था हिंदी मीडियम वाले भी बैटर कर सकते हैं । । जब अनुवाद की बारी होती तो वो मुझसे अनुवाद करवातीं और पूरी क्लास को मैं ही समझाती क्योंकि उनको तो हिंदी आती ही नहीं थी । तो अपने को भाषाओं से बहुत प्यार है । हिंदी मां है मां रहेगी बाकी सब मौसियां हैं । अंग्रेंजी आंटी है । और भई हम तो कमाई ही हिंदी पत्रकारिता की खा रहे हैं । हिंदी मेरी महासरस्वती मां हैं तो साथ ही महालक्ष्मी भी हैं । हिंदी वाले कह कर कोई अपमानित भी करना चाहे मेरी बला से मुझे हिंदी भाषी होने पर गर्व है । बोलने पर कोई कांप्लेक्स भी नहीं है ।

सर्जना शर्मा

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